अनुराग राजू मिश्रा(स्टेट हेड)
शाहजहांपुर में गणतंत्र दिवस 2026 के लिए जो तिरंगा बनवाने का खेल चला, वो कमाल का था सरकार ने सोचा था कि ग्रामीण बहनों को हाथ से झंडे सिलवाकर 20 रुपये प्रति पीस देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाएंगे। बहनें खुश, देश में तिरंगा लहराएगा, सबका भला!
लेकिन हमारे “स्मार्ट” अफसरों ने सोचा – क्यों मेहनत करवाएं जब बाजार में 8-10 रुपये में तैयार तिरंगा मिल रहा है? दिल्ली-लखनऊ से ट्रक भरकर मंगवाओ, फिर कागजों में लिख दो कि SHG (स्वयं सहायता समूह) की बहनों ने बनाए हैं। भुगतान? सीधे बहनों के खाते में 20 रुपये प्रति झंडा ट्रांसफर करो, लेकिन असल में पैसे का बड़ा हिस्सा “प्रखर इंटरप्राइजेज” जैसी फर्मों के पास चला जाए, और बाकी का थोड़ा-बहुत DMM और BMM की जेब में!
जलालाबाद ब्लॉक का सीन तो देखिए – 9 SHG को 40 हजार रुपये मिले, लेकिन 34 हजार सीधे फर्म को, और बाकी 5-6 हजार अध्यक्ष बहनों से “काट” लिए गए। बहनें सोच रही होंगी – “अरे, हमने तो एक भी सुई नहीं लगाई, फिर ये पैसे कहां से आए?”
पूरे जिले में 2 लाख झंडे बनाने थे SHG से, लेकिन सिर्फ 1.60 लाख ही “बने” (कागजों में), 32 लाख रुपये ट्रांसफर हो गए।
अब मजेदार बात ये है कि झंडा तो तिरंगा है, लेकिन खेल “काला-पीला-नीला” चल रहा है
सूत्र बता रहे हैं – एजेंडा रजिस्टर खोलो, बहनों के बयान लो, तो सारा खेल खुल जाएगा। जिला समन्वयक प्रदीप यादव के “संरक्षण” के बिना ऐसा बड़ा ड्रामा तो चल ही नहीं सकता। कुल मिलाकर, जिले में अनियमितता की रकम लाखों-करोड़ों में हो सकती है।
अब सवाल ये है – क्या तिरंगा फहराने वाले अफसर खुद उसके सम्मान की रक्षा करेंगे, या फिर बस कागजों पर फहराते रहेंगे?
बहनों की मेहनत का पैसा लूटना कोई छोटी बात नहीं – ये देशभक्ति का मजाक है! जांच होनी चाहिए, ताकि असली “हर घर तिरंगा” वाले सपने पूरे हों, न कि कुछ लोगों की जेबें!































