रिपोर्ट – रोचक अग्निहोत्री (शाहजहांपुर)
शाहजहाँपुर – भारत की आत्मा में रचा-बसा शास्त्रीय संगीत आज आधुनिकता की तेज धुनों के बीच कहीं फीका पड़ता जा रहा है। राष्ट्रीय संगीत दिवस के मौके पर यह सवाल बेहद प्रासंगिक हो गया है—क्या हमारी युवा पीढ़ी शास्त्रीय संगीत से दूर होती जा रही है?
जहां एक ओर देश का शास्त्रीय संगीत राग, सुर और लय की महीन बुनावट से बना एक दिव्य अनुभव रहा है, वहीं आज का युवा पॉप, रैप और इलेक्ट्रॉनिक डांस म्यूजिक (EDM) की ओर तेजी से आकर्षित हो रहा है। नये दौर की यह धुनें कम समय में त्वरित मनोरंजन तो देती हैं, लेकिन क्या आत्मा को छू पाती हैं?
“धैर्य की कमी, परंपरा से दूरी”
स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज, शाहजहाँपुर की संगीत अध्यापिका डॉ. प्रतिभा सक्सेना ने कहा,“आज के युवाओं में धैर्य की भारी कमी है। उन्हें लगता है कि आज सीखें और कल मंच पर छा जाएं। लेकिन शास्त्रीय संगीत तो साधना है वर्षों की तपस्या। दुख की बात है कि आज के विद्यार्थी गुरु का सम्मान भी भूलते जा रहे हैं। अगर डांट दिया जाए तो उन्हें चोट लग जाती है।”
डॉ. सक्सेना यह भी कहती हैं कि गुरु-शिष्य परंपरा, जो भारतीय संगीत की आत्मा रही है, वह अब सिमटती जा रही है।आज के संगीत प्रेमी सिर्फ डिजिटल ट्यूनिंग और ऑटो-ट्यून पर ही भरोसा करते हैं, जबकि सुर की शुद्धता कभी ‘तानपुरा’ से साधी जाती थी।
संगीत सिर्फ सुरों का खेल नहीं, भावों की अभिव्यक्ति भी है। शास्त्रीय संगीत वही है जो आत्मा को झंकृत कर दे, तन-मन को तरंगित कर दे। लेकिन इसके लिए आवश्यक है – ठहराव, साधना, और परंपरा के प्रति श्रद्धा।
????राष्ट्रीय संगीत दिवस पर यह सोचने का वक्त है “क्या हम अपनी सुरों की थाती अगली पीढ़ी को सौंप पाएंगे?”या फिर यह बस पुस्तकों और पुराने रिकॉर्ड्स तक सीमित रह जाएगी?































