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2007 से हर चुनाव में बदला विधायक, टिकट को लेकर भाजपा में मंथन तेज; सपा की सीट बचाने की चुनौती

रिपोर्ट/नारद संवाद न्यूज़ एजेंसी।

रामनगर में नहीं चलता रिपीट का जादू, क्या भाजपा फिर बदलेगी चेहरा

रामनगर बाराबंकी। जिले की वीआईपी मानी जाने वाली रामनगर विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास हमेशा से राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बना रहा है। इस सीट की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहां की जनता ने वर्ष 2007 के बाद किसी भी विधायक को लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचने का मौका नहीं दिया। हर चुनाव में मतदाताओं ने नया जनादेश देकर सियासी समीकरण बदल दिए हैं।रामनगर विधानसभा में वर्ष 2007 में बसपा के अमरेश शुक्ला विधायक बने। वर्ष 2012 में सपा के अरविंद कुमार सिंह ‘गोप’ ने जीत दर्ज की। वर्ष 2017 में भाजपा के शरद कुमार अवस्थी ने उन्हें पराजित कर सीट पर कब्जा जमाया, जबकि वर्ष 2022 में समाजवादी पार्टी के फरीद महफूज किदवई ने कड़े मुकाबले में भाजपा प्रत्याशी को शिकस्त देकर इतिहास को दोहराया। लगातार चार चुनावों में चार अलग-अलग चेहरे विधायक बनने से यह सीट प्रदेश की उन चुनिंदा सीटों में शामिल हो गई है जहां मतदाता बदलाव को प्राथमिकता देते दिखाई देते हैं। वर्ष 2022 का चुनाव विशेष रूप से चर्चा में रहा। हिंदू बाहुल्य मानी जाने वाली इस विधानसभा में भाजपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला हुआ। फरीद महफूज किदवई और शरद कुमार अवस्थी के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली, जिसमें सपा प्रत्याशी ने मामूली अंतर से जीत हासिल की। इस परिणाम ने यह संदेश दिया कि रामनगर में जातीय और धार्मिक गणित से अधिक उम्मीदवार की स्वीकार्यता, स्थानीय समीकरण और संगठनात्मक मजबूती महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा में सबसे अधिक हलचल दिखाई दे रही है। पार्टी से एक दर्जन से अधिक नेता टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। संभावित उम्मीदवारों के बीच खींचतान और अंदरूनी प्रतिस्पर्धा भी चर्चा का विषय बनी हुई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा वर्ष 2022 में पराजित हुए प्रत्याशी पर एक बार फिर भरोसा जताएगी या फिर जीत का नया फार्मूला तलाशते हुए किसी नए चेहरे को मैदान में उतारेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि रामनगर का चुनाव केवल दलों की लोकप्रियता से तय नहीं होता, बल्कि उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, क्षेत्र में सक्रियता और स्थानीय समीकरण भी निर्णायक साबित होते हैं। यही कारण है कि जिले के कद्दावर सपा नेता और पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप भी 2017 में दूसरी बार जीत दर्ज नहीं कर सके थे। चुनाव में अभी समय है, लेकिन टिकट को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म होने लगा है। भाजपा, सपा और अन्य दल क्षेत्रीय समीकरणों, जातीय संतुलन और पिछले चुनावों के मतदान रुझानों का आकलन कर रहे हैं। ऐसे में एक बार फिर रामनगर विधानसभा सीट जिले की सबसे चर्चित और प्रतिष्ठापूर्ण सीट बनने की ओर बढ़ रही है, जहां सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जनता इस बार बदलाव का सिलसिला जारी रखेगी या इतिहास टूटेगा।

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