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Naradsamvad

फर्जी पत्रकारों, अवैध वसूली और माफिया गठजोड़ ने ईमानदार पत्रकारिता को कठघरे में खड़ा किया

Vivek Shukla
5 Min Read

विचार/विवेक शुक्ला

रामनगर में पत्रकारिता की साख पर संकट

रामनगर बाराबंकी।कभी समाज का दर्पण कही जाने वाली पत्रकारिता आज अपने ही अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। एक समय था जब पत्रकार की कलम सत्ता की नींव हिला दिया करती थी, लेकिन वर्तमान दौर में कुछ तथाकथित पत्रकारों की हरकतों के चलते यह पवित्र पेशा बदनामी के दौर से गुजर रहा है। देश की आज़ादी में अहम भूमिका निभाने वाली पत्रकारिता आज मूल्यों से भटकती नजर आ रही है।

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डिजिटल युग में सूचना की क्रांति के साथ पत्रकारों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन पत्रकारिता के आदर्श और मर्यादाएं कहीं पीछे छूटती जा रही हैं। रामनगर तहसील क्षेत्र में हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि असली और जिम्मेदार पत्रकार भी संदेह के घेरे में खड़े दिखाई देने लगे हैं।

खनन माफिया और लकड़कट्टों से सांठगांठ का आरोप

सूत्रों के अनुसार, तहसील रामनगर क्षेत्र में कुछ तथाकथित पत्रकार खनन माफियाओं और लकड़ी तस्करों से मिलीभगत कर अवैध वसूली में सक्रिय हैं। पत्रकारिता की आड़ में यह लोग न केवल गैरकानूनी गतिविधियों को संरक्षण दे रहे हैं, बल्कि प्रशासन और पुलिस पर दबाव बनाकर कार्रवाई रुकवाने का प्रयास भी करते हैं।

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पत्रकारिता के नाम पर खुलेआम वसूली

क्षेत्र में सक्रिय कई ट्यूबर और फर्जी पीडीएफ आधारित तथाकथित पत्रकार खुद को “बड़े अखबारों का पत्रकार” बताकर माफियाओं से सौदेबाजी करते हैं। इनका उद्देश्य खबर प्रकाशित करना नहीं, बल्कि अवैध धंधों से आर्थिक लाभ कमाना है। कार्रवाई न होने देने के बदले मोटी रकम वसूली जाती है।

‘प्रेस कार्ड’ बना ढाल, गाड़ी पर ‘प्रेस’ लिखकर रौब

बिना किसी मान्यता, अनुभव या संस्थान के ये लोग फर्जी प्रेस कार्ड और गाड़ियों पर ‘प्रेस’ लिखवाकर खुलेआम घूमते हैं। इनकी सक्रियता उन्हीं स्थानों तक सीमित रहती है जहां से निजी स्वार्थ की पूर्ति हो सके। रिपोर्टिंग की जगह सौदेबाजी इनका मुख्य कार्य बन चुका है।

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लिखना-पढ़ना नहीं आता, कॉपी-पेस्ट से चल रही पत्रकारिता

फर्जी रौब झाड़ने वाले इन तथाकथित पत्रकारों की बाढ़ सी आ गई है। हालत यह है कि कई को ठीक से लिखना-पढ़ना तक नहीं आता। शाम होते ही सोशल मीडिया पर चल रही खबरों को कॉपी-पेस्ट कर अपनी तथाकथित ‘रिपोर्टिंग’ पूरी कर लेते हैं।

ईमानदार पत्रकारों की छवि पर दाग

इन गतिविधियों का सबसे बड़ा नुकसान उन पत्रकारों को हो रहा है, जो निष्ठा और ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस के समक्ष जब कोई वास्तविक पत्रकार किसी गंभीर मुद्दे को उठाता है, तो उसे भी संदेह की नजर से देखा जाता है। इससे पत्रकारिता की साख को गहरा आघात पहुंच रहा है।

प्रशासन को गुमराह करने की साजिश

बताया जाता है कि ये तथाकथित पत्रकार खनन और जंगल कटान जैसे संगठित अपराधों में लिप्त लोगों से सौदेबाजी कर प्रशासनिक कार्रवाई से बचाने का दावा करते हैं। सौदा तय न होने पर कार्रवाई करवाने की धमकी तक दी जाती है। कई मामलों में इन्हें माफियाओं के मुखबिर के रूप में भी देखा गया है।

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चौथे स्तंभ को बचाने की जरूरत

लोकतंत्र के तीन स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के साथ पत्रकारिता को चौथा स्तंभ माना जाता है। यदि यही स्तंभ भ्रष्टाचार और अनैतिकता से खोखला हो गया, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर पड़ सकती है।
स्थानीय जनता और जिम्मेदार पत्रकारों ने प्रशासन से मांग की है कि फर्जी पत्रकारों की निष्पक्ष जांच कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही प्रेस मान्यता प्रक्रिया को पारदर्शी और प्रमाणिक बनाया जाए।

लकड़ी तस्करी और अवैध खनन जैसे गंभीर अपराधों में तथाकथित पत्रकारों की संलिप्तता पत्रकारिता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। यदि समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो न केवल पत्रकारिता की गरिमा समाप्त होगी, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।

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