Naradsamvad

[post-views]

Uttarakhand Dharali Village Cloudburst | Cloud Burst Explained | भास्कर एक्सप्लेनर-34 सेकंड में बह गया पूरा गांव: 300 करोड़ लीटर से ज्यादा बारिश, क्या वाकई बादल फटता है, उत्तराखंड में ज्यादा खतरा क्यों

[ad_1]

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में पहाड़ से पानी का एक सैलाब और उसके साथ ढेर सारा मलबा आया और 34 सेकंड के अंदर एक पूरा का पूरा गांव बह गया। अब तक 4 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है और 50 से ज्यादा लोग लापता हैं। इस भयंकर तबाही की वजह है- बादल फटना।

.

क्या वाकई बादल फटता है, इसके पीछे की साइंस क्या, बादल फटने से उत्तराखंड में सबसे ज्यादा तबाही क्यों मचती है, जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में…

सवाल-1: उत्तराखंड में बादल फटने की घटना क्या है, जिसमें पूरा गांव बह गया?

जवाब: उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में पिछले दो दिनों से लगातार तेज बारिश हो रही थी। इसके चलते एक नाला उफान पर आ गया। पहाड़ों से होते हुए नाले का पानी मंगलवार दोपहर 01.45 बजे अचानक धराली गांव में सैलाब की तरह आया। इस सैलाब से सिर्फ 34 सेकंड में पूरे गांव में पानी भर गया।

उत्तरकाशी के डीएम प्रशांत आर्या के मुताबिक अबतक 4 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। लोगों के घरों, दुकानों, होटल और रेस्टोरेंट में पानी भर गया है। कई घर पूरी तरह पानी में डूब चुके हैं।

NDRF और SDRF की टीमें इलाकें में रेसक्यू ऑपरेशन चला रही है। देहरादून में सेना के जनसंपर्क अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल मनीष श्रीवास्तव के मुताबिक अब तक 20 लोगों का रेस्क्यू किया जा चुका है।

बादल फटने से धराली गांव में कुछ इस तरह तबाही मची।

बादल फटने से धराली गांव में कुछ इस तरह तबाही मची।

सवाल-2: ये बादल फटना होता क्या है? क्या वाकई बादल फट जाता है?

जवाब: छोटे से इलाके में बहुत कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने को बादल फटना कहते हैं।

इसमें बादल के फटने जैसा कुछ नहीं होता। हां, ऐसी बारिश इतनी तेज होती है जैसे बहुत सारे पानी से भरी एक बहुत बड़ी पॉलीथीन आसमान में फट गई हो। इसलिए इसे हिंदी में बादल फटना और अंग्रेजी में cloudburst के नाम से पुकारा जाता है।

इस बादल फटने की गणित को समझते हैं- मौसम विभाग के मुताबिक, जब अचानक 20 से 30 वर्ग किलोमीटर के इलाके में एक घंटे या उससे कम समय में 100mm या उससे ज्यादा बारिश हो जाए तो इसे बादल फटना कहते हैं। कई बार चंद मिनटों में ये बारिश हो जाती है। यहां अचानक शब्द के भी मायने हैं। आमतौर पर बादल कब फटेगा, इसका पहले से अनुमान लगाना मुश्किल होता है।

सवाल 3: बादल फटने पर किसी इलाके में कितना पानी बरस जाता है?

जवाब: इसके लिए सबसे पहले 1mm बारिश का मतलब समझते हैं। 1mm बारिश होने का मतलब है कि 1 मीटर लंबे और 1 मीटर चौड़े यानी 1 वर्ग मीटर इलाके में 1 लीटर पानी बरसना। अब इस गणित को बादल फटने की परिभाषा पर फिट कर दें, तो जब भी 1 मीटर लंबे और 1 मीटर चौड़े इलाके में 100 लीटर या उससे ज्यादा पानी बरस जाए, वो भी एक घंटे या उससे भी कम समय में, तो समझिए कि इस इलाके पर बादल फट गया।

बस 100 लीटर!! यूं तो आपको ये आंकड़ा बहुत छोटा लग रहा होगा, लेकिन अगर 1 वर्ग मीटर के बजाय 1 वर्ग किलोमीटर के इलाके की गणित समझें तो, जब भी 1 वर्ग किमी इलाके में एक घंटे से कम समय में 10 करोड़ लीटर पानी बरस जाए तो समझिए वहां बादल फट गया। यानी अगर उत्तरकाशी में बादल फटा है तो उसके 20 से 30 वर्ग किलोमीटर के इलाके में एक घंटे से भी कम समय में 200 से 300 करोड़ लीटर से ज्यादा पानी बरस गया होगा।

ये कितना ज्यादा पानी है, इसको एक और उदाहरण से समझते हैं- भारत में हर शख्स औसतन 170 लीटर पानी रोज इस्तेमाल करता है। इस हिसाब से गुणा भाग करें तो बादल फटने पर जितना पानी 1 घंटे से भी कम समय में बरस जाता है उतना पानी करीब 20 लाख लोग 9 दिनों तक इस्तेमाल करते हैं। भारत के करीब 300 शहरों की आबादी 20 लाख के आस-पास है।

पहाड़ी इलाकों में बादल फटने की तस्वीर।

पहाड़ी इलाकों में बादल फटने की तस्वीर।

सवाल-4: बादल फटने और और तेज बारिश में क्या अंतर है?

जवाब: तेज बारिश और बादल फटने में पानी की मात्रा का अंतर है- जैसा हमने पहले बताया कि जब 20 से 30 वर्ग किलोमीटर के इलाके में एक घंटे से कम समय मे 100 mm या इससे ज्यादा बारिश हो जाए तो इसे बादल फटना कहते हैं।

पानी की मात्रा के अलावा दोनों में सबसे बड़ा अंतर ये है कि बारिश या तेज बारिश का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है, लेकिन बादल फटने का नहीं। यानी बादल फटने पर अचानक और बहुत तेजी से बारिश होती है।

सवाल-5: आखिर बादल फटता क्यों है?

जवाब: दरअसल, बादल, सूरज की गर्मी के चलते समुद्र के ऊपर बने भाप के गुबार होते हैं, जो समुद्र की नम हवाओं के साथ बहकर धरती के ऊपर आते हैं। घने बादलों वाली ये नम हवा जब समुद्र से धरती पर पहुंचती हैं तो हम कहते हैं मानसून आ गया।

फ्रिज का ठंडा पानी किसी गिलास या जग में भरने पर उसकी सतह पर पानी जमा हो जाता है। ठीक ऐसे ही जब ऊपरी वातावरण में बादल ठंडे होते हैं तो बूंदों में बदलने लगते हैं। जब ये बूंदें भारी होकर धरती पर गिरने लगती हैं, तो इसे ही बारिश कहा जाता है।

मानसूनी हवाओं वाले बादल हिमालय से टकराकर धीरे-धीरे भारी मात्रा में जमा हो जाते हैं और एक ऐसा समय आता है कि किसी इलाके ऊपर मंढरा रहे ये बादल पानी से भरी एक थैली तरह फट जाते हैं। यानी बहुत तेजी से एक छोटे से इलाके में बरस पड़ते हैं।

सवाल-6: बादल अक्सर उत्तराखंड के ऊंचे इलाकों के आस-पास क्यों फटते हैं?

जवाब: बादल आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में फटता है। जैसा हमने पहले बताया, हिमालय से टकराकर मानसूनी बादल धीरे-धीरे भारी मात्रा में जमा हो जाते हैं और बादल फटने का माहौल बन जाता है। यही वजह है कि अक्सर बादल उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों के हिमालयी पहाड़ों के इलाके में फटते हैं। हालांकि बादल मैदानी इलाकों में भी फट सकता है, लेकिन आम तौर पर पहाड़ी इलाकों में इसका खतरा ज्यादा होता है।

सवाल-7: उत्तराखंड में बादल फटने पर ज्यादा तबाही क्यों होती है?

जवाब: इसकी वजह है- पानी के साथ भारी मात्रा में पहाड़ों का मलबा ऊंचे इलाकों से नीचे की तरफ आना। दरअसल, बादल फटने पर भारी मात्रा में पानी पहाड़ों की चट्टानों से टकराता है। इससे पहाड़ों में लैंडस्लाइड यानी भूस्खलन होता है और पानी के साथ भारी मात्रा में पहाड़ों का मलबा भी नीचे आता है, जो रिहायशी इलाकों और मकानों पर ज्यादा असर करता है। पूरे के पूरे गांव इस मलबे में दब जाते हैं। उत्तराखंड के हिमालयी इलाकों में बादल फटने पर लैंडस्लाइड का खतरा सबसे ज्यादा है।

सवाल-8: उत्तराखंड में बादल फटने पर लैंडस्लाइड क्यों होता है?

जवाब: उत्तराखंड में बादल फटने या तेज बारिश होने पर लैंडस्लाइड की 2 बड़ी वजहें हैं…

1. हिमालय के पहाड़ नए और कमजोर हैं

  • हिमालय दुनिया की सबसे नई पर्वत श्रृंखला मानी जाती है। यह पृथ्वी की ऊपरी परत यानी क्रस्ट की टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से बना है। इसलिए हिमालय के पहाड़ों की चट्टानें भुरभुरी और कमजोर मिट्टी की बनी हैं।
  • बादल फटने पर इन पहाड़ों से मिट्टी पर हाइड्रोस्टेटिक यानी पानी का प्रेशर बढ़ता है, मिट्टी होने के चलते इसकी जमीन पर पकड़ नहीं होती और भारी मात्रा में मिट्टी मलबे के रूप में पानी के साथ निचले इलाकों में पहुंचती है।

2. जंगलों की कटाई के चलते पहाड़ों का कमजोर होना

  • पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधे रखने का काम करती हैं। हिमालय के पहाड़ी इलाकों में पेड़ों की कटाई के चलते मिट्टी की चट्टानें ढीली पड़ गई हैं। ऐसे में तेज पानी का फ्लो आसानी से इस मिट्टी को बहा ले जाता है।

इसके अलावा उत्तराखंड के इलाकों में नदियों में पानी कम होने और बांध बनाने के चलते नदियों का रास्ता संकरा हो गया है। ऐसे में बादल फटने पर तेजी से पानी बढ़ता है और नदियों के किनारे छोड़कर बाकी इलाके की मिट्टी और मलबे को भी साथ बहा ले जाता है।

बदल फटने के बाद आए मलबे में घिरे धराली गांव के घर।

बदल फटने के बाद आए मलबे में घिरे धराली गांव के घर।

सवाल-9: किन महीनों में बादल फटने का सबसे ज्यादा डर होता है?

जवाब: भारत के सबसे दक्षिणी राज्य केरल में मानसून आमतौर पर एक जून को पहुंचता है। समुद्री नमी और बादलों वाली ये हवाएं जुलाई के पहले सप्ताह तक हिमालय तक पहुंचती हैं। मानसून भी जुलााई, अगस्त और सितंबर के दौरान सबसे ज्यादा सक्रिय होता है। यही वजह है कि हिमालय हो या मैदानी इलाके, बादल अक्सर जुलाई, सितंबर और अक्बूटर में फटते हैं।

सवाल-10: इंसानों की वजह से मौसम में होने वाले बदलाव यानी क्लाइमेट चेंज का बादल फटने से कोई लेना-देना है?

जवाब: कई स्टडीज बताती हैं कि क्लाइमेट चेंज की वजह से बादल फटने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं और उनकी तीव्रता भी। वर्ल्ड मिटियोरॉजिकल ऑर्गनाइजशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘बीते 4 सालों से दुनिया का औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। तापमान बढ़ने की दर के हिसाब से हिमालय के इलाके में बादल फटने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। बादल फटने की बढ़ती घटनाओं के चलते अचानकर बाढ़ आना, पहाड़ दरकना, मिट्टी का कटान और जमीन धंसने के मामले भी बढ़ते जाएंगे।

——–

ये खबर भी पढ़ें…

उत्तराखंड में बादल फटने का अनकट VIDEO:पहाड़ से पानी के साथ मलबा आया, नदी किनारे बसा पूरा गांव दब गया

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में मंगलवार दोपहर 1.45 बजे बादल फटा। गंगोत्री के पहाड़ों से बहने वाली खीर गंगा नदी में बाढ़ आ गई। तेज रफ्तार पानी के साथ आए मलबे ने 34 सेकेंड में धराली गांव को जमींदोज कर दिया। पूरी खबर पढ़ें…

[ad_2]

Source link

अन्य खबरे

गोल्ड एंड सिल्वर

Our Visitors

498232
Total Visitors
error: Content is protected !!