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‘आज भी हर दिन बच्चों की याद सताती है। ये सब ऑपरेशन सिंदूर की वजह से हुआ। बॉर्डर के आस-पास के इलाकों में बिना कुछ बताए ये ऑपरेशन कर दिया। अगर हमें पहले से पता होता तो पुंछ से बाहर किसी रिश्तेदार के यहां चले जाते। हमें बच्चों की मौत के बदले पैसे नहीं च
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पुंछ में रहने वाली उरूसा खान के जुड़वां बच्चों ने 7 मई की सुबह पाकिस्तानी गोलीबारी में जान गंवा दी। पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों के खिलाफ चलाए गए भारत के ऑपरेशन सिंदूर के जवाब में ये फायरिंग की गई थी। हमले को ढाई महीने बीत चुके हैं, लेकिन उरूसा उस दिन को याद कर आज भी भावुक हो जाती हैं। उरूसा अकेली नहीं हैं। पुंछ और राजौरी में अपनों को खोने वाले कई परिवारों के जख्म आज भी ताजा हैं।
वहीं घरों-मकानों पर पाकिस्तानी गोलीबारी के निशान भी जिंदा हैं। पुंछ में बॉर्डर से सटे आखिरी गांव करमाडा में इस बमबारी में कई मकान तबाह हुए थे। सरकार ने नुकसान के बदले मुआवजा भी दिया, लेकिन वो काफी नहीं लग रहा। राजौरी में भी लोग घरों में नुकसान दिखाकर और मुआवजे की मांग कर रहे हैं।

पुंछ और राजौरी में पाकिस्तानी गोलाबारी में जिन लोगों ने नुकसान उठाया, अब वे किस हाल में हैं? सबसे ज्यादा संवेदनशील बॉर्डर के आखिरी गांवों में क्या बदला है? पुंछ में अपना घर छोड़कर पलायन कर गए लोग अब लौटकर कैसे टूटे-फूटे घरों को संभाल रहे हैं? ये जानने दैनिक भास्कर की टीम ग्राउंड पर पहुंची…
सबसे पहले पुंछ की बात… जुड़वां बच्चों को खोया, अब किस हाल में परिवार? पहलगाम हमले के बाद भारतीय सेना ने 7 मई को पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाते हुए ऑपरेशन सिंदूर चलाया। इसके जवाब में अगले दिन सुबह से पाकिस्तान ने सीमा पार से भारत के बॉर्डर वाले इलाकों में गोलाबारी शुरू कर दी। इसका सबसे ज्यादा नुकसान जम्मू के पुंछ जिले में हुआ।
पाकिस्तानी बमबारी के दौरान कई गोले पुंछ के वार्ड नंबर-3 में क्राइस्ट स्कूल के आसपास भी गिरे। स्कूल के सामने वाली गली में सरकारी टीचर रमीज खान किराए के मकान में रहते थे। उनके दोनों जुड़वां बच्चे अयान और उर्वा फातिमा इसी स्कूल में पढ़ते थे।

घटना के ढाई महीने पहले ही रमीज बच्चों की पढ़ाई के लिए किराए के मकान में शिफ्ट हुए थे। 7 मई को गोलाबारी के बीच जब रमीज का परिवार सुरक्षित जगह पर जाने के लिए घर से निकला, तभी एक शेल उनके घर के सामने आकर गिरा। इसमें उनके दोनों बच्चों की मौत गई। वहीं वे खुद गंभीर रूप से घायल हो गए।
रमीज की पत्नी उरूसा उस दिन को याद करते हुए बताती हैं, ‘मेरे भाई सुरनकोट से गाड़ी लेकर हमें साथ ले जाने आए थे। हम बच्चों को लेकर घर से निकले, लेकिन गेट से 10 कदम ही चले थे कि एक और धमाका हुआ।’
बेटी ने हाथ पकड़ रखा था, लेकिन वो खून से लथपथ हो गई। उसने उसी वक्त दम तोड़ दिया। मेरा बेटा सड़क पर थोड़ी दूर गिरा था। उसे CPR देने की कोशिश की, लेकिन उसे भी नहीं बचा सके।

सरकार ने रमीज के परिवार को 20 लाख रुपए की आर्थिक मदद और उरूसा को सरकारी स्कूल में नौकरी दी है। हालांकि, उरूसा दोनों बच्चों को शहीद का दर्जा देने की मांग कर रही हैं। वे कहती हैं, हमारे परिवार को ज्यादा पैसे नहीं चाहिए। बस बच्चों के लिए सम्मान चाहिए।’

दोनों बच्चे नहीं रहे, पिता को 12 दिन बाद पता चला हम जब रमीज से मिले तो उनके हाथ में ऑपरेशन के बाद सपोर्ट के लिए एंगल लगा था। उन्होंने हमें बच्चों का कमरा दिखाया, जहां अब भी उनके खिलौने उनके इंतजार में रखे हैं। दीवार पर बच्चों की तस्वीरें भी लगी हैं।
रमीज बताते हैं कि रात में सोते समय आज भी बच्चों को याद कर वो और उनकी पत्नी आंसू नहीं रोक पाते। जब ये घटना हुई तो रमीज भी जख्मी हुए थे। हालत गंभीर थी इसीलिए पत्नी उरूसा ने 12 दिनों तक उन्हें बच्चों के बारे में नहीं बताया। अस्पताल में पूछने पर कह दिया कि मम्मी के पास छोड़कर आई हैं।

अयान और उर्वा के कमरे की तस्वीर, जहां दोनों साथ पढ़ते और खेलते थे।
रमीज इलाज में आए खर्च में मदद की मांग करते हुए कहते हैं, ‘मेरा जम्मू में फ्री इलाज हुआ, लेकिन अमृतसर में 1.5 लाख रुपए खर्च हुए। डॉक्टर कह रहे हैं कि एक-दो महीने की दवा के बाद शायद दोबारा ऑपरेशन करना पड़े, जिसका खर्च भी हमें ही उठाना होगा।‘
उरूसा को एजुकेशन डिपार्टमेंट में सरकारी नौकरी मिली है, लेकिन उनकी पोस्टिंग को लेकर परिवार संतुष्ट नहीं है। पति रमीज कहते हैं, ‘पोस्टिंग चंडक में मिली है, जो बहुत दूर है। 20 किलोमीटर की दूरी में दो-तीन गाड़ियां बदलकर जाना पड़ता है, इसीलिए पोस्टिंग थोड़ी नजदीक हो जाए।‘

पुंछ का आखिरी गांव… लोग बोले- पहली बार हुई ऐसी गोलाबारी, मरम्मत के लिए मुआवजा नाकाफी इसके बाद हम पुंछ में खड़ी करमाडा पहुंचे। ये पाकिस्तानी सीमा से सटा भारत का आखिरी गांव है। यहां से LoC और PoK साफ नजर आता है। करमाडा में रहने वाले बताते हैं कि इससे पहले कभी इतनी भारी गोलाबारी नहीं हुई। इस गांव के लगभग हर घर में शेलिंग के निशान दीवारों पर दिख जाते हैं।
हम सबसे पहले शब्बीर हुसैन के घर पहुंचे। 7 मई की सुबह उनके घर पर भी शेलिंग हुई थी। बमबारी में खिड़कियों के टूटे कांच, दीवार का टूटा पिलर और छत पर गड्ढे आज भी मौजूद हैं।
शब्बीर हमें बमबारी के वक्त गांव का हाल बताते हैं, ‘जब गोलीबारी शुरू हुई, तब पूरा गांव खौफ में डूब गया था। आवाज इतनी तेज थी कि कान सुन्न पड़ गए। हम लोग किचन के नीचे बने एक छोटे से कमरे में छिप गए।‘

शब्बीर ने इतनी बमबारी के बाद भी गांव नहीं छोड़ा। वे बताते हैं, ‘मैंने पहले ही दिन बच्चों को सेफ जगह पर भेज दिया था। हम आखिर कहां जाते? हमारा गांव, जमीन और मवेशी सब यहीं हैं। सेना ने सीजफायर के बाद हौसला बढ़ाया। हमने सोचा अपने गांव में ही रहेंगे।‘
शब्बीर को मुआवजे के तौर पर 1 लाख 30 हजार रुपए मिले हैं, लेकिन वो इससे खुश नहीं हैं और कहते हैं कि ये पूरी मरम्मत के लिए काफी नहीं हैं। हालांकि, वे उम्मीद जताते हैं कि सरकार ने और मदद का ऐलान किया था और आने वाले समय में ऐसा किया भी जाएगा।

बॉर्डर से सटे गांव में बंकर बढ़ाने की मांग शब्बीर की तरह ही हाजी वजीर मोहम्मद भी करमाडा में ही रहते हैं। वे सेना में हवलदार रह चुके हैं। 55 साल के हाजी 1994 में रिटायर हुए थे।
वे बताते हैं, ‘ज्यादातर लोग तो गांव छोड़ गए और जो रुके वे सिर्फ अपनी रोजी-रोटी भेड़-बकरी और मवेशियों के लिए ही रुके।‘ उन्होंने हमें गांव में बना एक बंकर दिखाया, जिसमें बमुश्किल 2 कमरे हैं। हाजी बताते हैं कि बमबारी के दिन इसी बंकर में 60 से 70 लोगों ने शरण ली थी।
वे गोलीबारी पर कहते हैं, ‘2003-2005 में भी पाकिस्तान की तरफ से भारी गोलीबारी हुई थी, लेकिन इस बार हालात ज्यादा खतरनाक थे। रात में जब मोर्टार और तोपों के गोले गिरे तब पूरा गांव धुएं में डूब गया। ऐसा लगा जैसे हमारे कानों के पर्दे फट गए। जैसा फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि हम बॉर्डर पर चक्की के पाटों में पिस रहे हैं। भागने की जगह नहीं है। हम 24 घंटे गोलीबारी के साए में जीते हैं।‘
हाजी मोहम्मद सरकार से गांव में और बंकर बनाने की मांग कर रहे हैं।

बमबारी में मकान तबाह, भाई के घर रह रहे 7 मई को पाकिस्तानी बमबारी शुरू होने पर करमाडा गांव से कई परिवार सुरक्षित जगहों पर पलायन कर गए थे। 40 साल की सैफी भी अपने बच्चों के साथ पुंछ छोड़कर बाहर चली गई थीं। अमन-चैन होने के बाद जब वापस लौटीं, तब उन्हें अपना घर बुरे हाल में मिला। बमबारी के दौरान उनके घर पर भी बम गिरा था। जिसमें उनका सारा सामान जलकर खाक हो गया। अभी वे अपने भाई मोहम्मद अल्ताफ के मकान में रह रही हैं।
सैफी ने बताया, ‘गोलीबारी शुरू हुई तो पहले दो दिन हम यहीं रुके। जब तीसरे दिन शेलिंग बढ़ गई, तब हम भी पुंछ के बाहर चले गए। उसी दिन बमबारी के दौरान मेरे मकान में आग लग गई। मेरा कमरा, सामान, बर्तन, बिस्तर, सब जल गया। रसोई का नामोनिशान नहीं बचा।‘
सैफी नुकसान के बदले मिले मुआवजे से खुश नहीं हैं।

अधिकारी बोले… सबकी मदद की गई, किसी को शिकायत हो तो दफ्तर आए मुआवजे और सरकारी मदद से नाखुश पुंछ के लोगों की बात लेकर हमने डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर से बात करने की कोशिश की। हालांकि उन्होंने कॉल नहीं उठाया। इसके बाद ऑफिस में मौजूद एक सीनियर अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर हमसे बात की।
मुआवजे को लेकर अधिकारी ने बताया कि मकानों के नुकसान का आकलन किया गया है। अगर मकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त है, पूरी तरह से या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है, तो सरकार के तय नियमों के अनुसार मुआवजा दिया जाता है। किसी के साथ अन्याय नहीं होता।

पाकिस्तानी बमबारी की वजह से करमाडा गांव में मकान की छतों पर ऐसे बड़े-बड़े छेद हो गए हैं।
जब हमने पूछा कि लोग नुकसान के मुकाबले कम मुआवजा मिलने की शिकायत कर रहे हैं। इस पर अधिकारी कहते हैं, ‘सभी प्रभावितों को मुआवजा दे दिया गया है। जिनके मामले बाकी हैं, उनके लिए फंड मंजूर होने के बाद जल्द भुगतान होगा। हमने ‘रिपोर्ट टु सपोर्ट’ नाम से एक समर्पित नंबर भी जारी किया था, ताकि लोग अपनी शिकायतें दर्ज करा सकें।‘
वहीं रमीज और उनकी पत्नी की ट्रांसफर की मांग पर अधिकारी ने कहा, ‘अगर किसी को नौकरी ट्रांसफर में कोई दिक्कत है, तो वे हमारे पास आ सकते हैं। हमारे दफ्तर के दरवाजे खुले हैं। कोई भी अपनी शिकायत लेकर आए, हम उसका समाधान करेंगे।‘
ऐसे नुकसान होने पर मुआवजे के लिए क्या हैं नियम जम्मू-कश्मीर जैसे बॉर्डर वाले राज्यों में सीमा पार से गोलीबारी या आतंकी गतिविधियों में लोगों की प्रॉपर्टी को होने वाले नुकसान के लिए भारत सरकार मुआवजा देती है। ये नीति मुख्य रूप से आपदा प्रबंधन और राहत विभागों के जरिए चलाई जाती है। ये केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग से काम करती हैं।

अब जानिए राजौरी का हाल… घर की मरम्मत में 4 लाख खर्च, मुआवजा मिला सवा लाख रुपए पुंछ की तरह राजौरी में भी पाकिस्तानी बमबारी में खूब तबाही हुई। यहां मेन मार्केट से लेकर बस स्टैंड और शहर के कई इलाकों में 3 दिन तक शेलिंग हुई। बस स्टैंड के पास ही मोहम्मद शफी का घर है।
वे 3 दिन तक हुई बमबारी को याद करके कहते हैं, ‘55 साल की उम्र में पहली बार इतनी तबाही देखी। रात 1:30 बजे से धमाकों की आवाज आनी शुरू हुई। जान बच गई यही बड़ी बात है।‘ शफी के घर में भी काफी नुकसान हुआ है। हालांकि, सरकार ने उन्हें 1 लाख 30 हजार मुआवजा दिया है।
शफी कहते हैं, ‘पाकिस्तानी बमबारी के दौरान हमारे घर में तीन ब्लास्ट हुए। पहले बमबारी से, बाकी दो घर में रखे सिलेंडर फटने से। इसमें मैं और मेरी बेटी घायल हुए। बेटी का पैर और हाथ बुरी तरह जख्मी हुआ।‘
मकान पूरी तरह बर्बाद हो गया। अब तक मरम्मत में ही 3.5 से 4 लाख रुपए का खर्च आ चुका है। रेडक्रॉस से सिर्फ 1 लाख 30 हजार रुपए का मुआवजा मिला, जो 35-40% नुकसान वाले घरों को दिया गया।

शफी सरकार से मुआवजा बढ़ाने की मांग करते हैं। साथ ही वे लोगों की सुरक्षा के लिए इंतजाम करने की भी अपील करते हैं, ताकि आगे कभी ऐसे हालात बनने पर किसी को अपने परिजन न खोने पड़ें। शफी की तरह ही राजौरी में कई और भी मकानों को नुकसान हुआ है। उन परिवारों को भी सरकार की तरफ से 1 लाख 30 हजार की मदद की गई है।
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‘22 अप्रैल की घटना के बाद टूरिज्म बिल्कुल ठप पड़ा है। पहले एक पोनी वाला दिन में 3 हजार से 4 हजार रुपए कमा लेता था, लेकिन हमले के बाद सब ठप हो गया। हमारी रोजी-रोटी टूरिज्म से ही चलती है। मेरी दो बेटियों की पढ़ाई का खर्च भी इसी से निकलता है।‘ पहलगाम में पोनी चलाने वाले गाइड नजाकत अहमद शाह आतंकी हमले के वक्त मौके पर ही मौजूद थे। उन्होंने 11 टूरिस्ट्स की जान बचाई थी। पढ़िए पूरी खबर…
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