Naradsamvad

[post-views]

Odisha Adivasi Story; SC ST Marriage Customs | Tribes Ritual Practices | ब्लैकबोर्ड-बेटी ने लव मैरिज की, 40 रिश्तेदारों ने सिर मुंडाया: लड़के से 70 हजार लेकर पिंडदान, बलि भी दी, वरना कोई बात तक न करता

[ad_1]

‘उस लड़की का नाम मत लीजिए। अब वह हमारे लिए मर चुकी है। अब उससे हमारा कोई रिश्ता नहीं। वह कभी अपने मां-बाप के घर वापस नहीं आ सकती। कैसे आएगी? क्यों आएगी? उसने हमारी मर्जी के खिलाफ जाकर लव मैरिज कर ली।

.

उस लड़की के जाने के ठीक 10 दिन बाद हमने पंडित बुलवाकर उसका अंतिम संस्कार कर दिया, जैसे किसी के मरने के बाद किया जाता है। सिर मुंडवाया, पिंड-दान किया और पूरे परिवार का शुद्धिकरण किया। भले ही वह जिंदा हो, लेकिन हमारे लिए, हमारे समाज के लिए मर चुकी है।’

सुम्मत माझी चचेरी बहन सायलेरी का नाम सुनते ही झल्लाते हुए ये बातें कहने लगे। फिर कुछ देर बाद चुप हो गए।

सायलेरी ने कुछ महीने पहले परिवार को बिना बताए, दूसरी जाति के रमेश के साथ शादी कर ली। इसी के बाद उसके परिवार और समाज के 40 लोगों ने अपना सिर मुंडवाकर अंतिम संस्कार और शुद्धिकरण किया, ताकि समाज में उनकी प्रतिष्ठा बनी रहे।

ऐसी कहानी अकेले सायलेरी के परिवार की नहीं है। ओडिशा के आदिवासी समुदाय के हर एक परिवार की है। ‘ब्लैकबोर्ड’ में इसी परंपरा के स्याह पहलू को समझने के लिए मैं रायगढ़ा के बाइगांगुड़ा गांव पहुंची।

हल्की बारिश में गीली और कच्ची सड़क से होते हुए मैं सुम्मत माझी के घर पहुंची। कच्चा-पक्का मकान। एस्बेस्टस से बनी छत से टपकती बारिश की बूंदे। मेरे आते ही पूरा परिवार इकट्ठा हो गया। सभी मर्दों ने अपने सिर मुंडवा रखे थे।

सायरेली के बारे में पूछते ही रुंधे गले से सुम्मत माझी कहने लगे- ‘ये बात अब हम लोग दोहराना नहीं चाहते हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि हमारी बेटी ने घर छोड़ा। बिना कुछ बताए वह चली गई। वो रमेश उसे बहला-फुसलाकर ले गया। हम कुछ समझ ही नहीं पाए कि ये सब कब और कैसे हो गया।’

कहते-कहते सुम्मत थोड़ा ठहर जाते हैं। वह बाकी लोगों को निहारने लगते हैं। मेरे दोहराने के बाद फिर कहते हैं- ‘हमें सिर मुंडवाना पड़ा, शुद्धिकरण करना पड़ा, नहीं तो हम समाज में रह नहीं पाते। सायलेरी ने जाति से बाहर शादी करके हमें अपवित्र कर दिया। उसने सिर्फ जाति की रेखा नहीं तोड़ी, बल्कि परंपरा भी तोड़ दी।’

लव मैरिज करने पर लड़की के 40 रिश्तेदारों ने मुंडन कराया था।

लव मैरिज करने पर लड़की के 40 रिश्तेदारों ने मुंडन कराया था।

‘इस तरह से शुद्धिकरण कब से हो रहा है?’

सुम्मत कुछ सोचकर कहते हैं- ‘हम आदिवासियों में तो बरसों से ये हो रहा है। जब हमारी समाज की लड़की दूसरी जाति में शादी कर लेती है, तो उसे अपवित्र माना जाता है। घर वालों को शुद्धिकरण करना पड़ता है। इसीलिए हमने भी सिर मुंडवाया, पूजा-पाठ किया। सूअर, बकरी और मुर्गे की बलि दी।’

‘अगर शुद्धिकरण न करें तो?’, सवाल खत्म होने से पहले ही झल्लाते हुए सुम्मत कहते हैं, ‘न करने का मतलब समझती हैं आप…। बिरादरी के लोग हमारे घर का एक गिलास पानी तक नहीं पीते। हमें बिरादरी से बाहर कर दिया जाता।’

सायरेली और रमेश दोनों दिव्यांग हैं। सायरेली का परिवार दोनों की तस्वीर तक नहीं देखना चाहता।

42 साल के खिरोद माझी रिश्ते में सायलेरी के चाचा लगते हैं। बातचीत के बीच वह आकर खाट पर बैठ जाते हैं। सुम्मत को रोकते हुए कहते हैं, ’सायरेली के फैसले ने पूरे समाज को तोड़कर रख दिया। लड़की ने दूसरी जाति में ब्याह करके समाज के रीति-रिवाजों को ही तोड़ दिया। जब कोई ऐसा करता है, तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान भुगतता है। अब वह हमारे लिए मरी हुई है।

गांव में ऊंची जाति के लोग पहले से ही हमारे साथ खाना-पीना नहीं खाते हैं। अगर हम शुद्धिकरण न करते, सिर नहीं मुंडवाते, तो हमारी ही बिरादरी के लोग हमसे दूर हो जाते। कोई हमारे घर नहीं आता, कोई हमारे साथ नहीं बैठता।’

गहरी सांस लेते हुए खिरोद फिर कहते हैं- सायलेरी की शादी के बाद पूरे परिवार को समाज ने ‘अपवित्र’ मान लिया। तब हमने पूरे विधि-विधान से अपनी बेटी का जीते-जी अंतिम-संस्कार करने का फैसला किया। सभी 40 लोग नदी गए, वहां स्नान किया। पूजा करने के बाद सिर मुंडवाया और बेटी के नाम पिंड-दान किया।

यह बाकियों के लिए रस्म रही होगी, लेकिन हमारे लिए तो अपने समाज में, अपनी बिरादरी में वापसी की कीमत थी।’

‘तो आप लोग बेटी-दामाद के घर कभी नहीं जाएंगे?’, ये सवाल सुनते ही खिरोद माझी खीझते हुए कहने लगे- ‘जब वो हमारे लिए मर चुकी है, तो उससे मिलना कैसा। अब न हम लोग उसके घर जा सकते हैं और न वो हमारे घर या समाज में कदम रख सकती है।

उसका अंतिम संस्कार न करते, तो हमारा जीना मुश्किल हो जाता। हमारे खानदान में पहली बार किसी ने जाति से बाहर शादी की। इसलिए हमारी बिरादरी के लोगों का दबाव और भी ज्यादा था।’

सायरेली के परिवार से मिलने के बाद इस स्याह परंपरा के दूसरे पहलू को जानने के लिए मैं उसके ससुराल पहुंची।

रमेश अपनी पत्नी सायरेली के साथ जीराउत घाटी गांव में रहते हैं। कच्चा मकान, 10 बाई 12 का छोटा-सा कमरा। इसी से सटे बरामदे में रखी खाट पर लुंगी पहने 25 साल के रमेश बैठे हैं। मुझे देखते ही वे थोड़ा असहज होने लगे। रमेश के पिता नहीं चाहते थे कि कोई उनके परिवार से बात करे। हालांकि, कुछ देर बाद वो बात करने के लिए राजी हो गए।

सवाल पूछने से पहले ही रमेश की आंखें डबडबाने लगती हैं। शायद उन्हें पता है कि मैं क्या पूछना चाह रही हूं। थोड़ा ठहरकर रमेश कहते हैं- ‘हमने तो बस एक-दूसरे से प्यार किया था, लेकिन समाज ने इसे गुनाह बना दिया। हम दोनों दिव्यांग हैं। एक बार काशीपुर गांव में दिव्यांग लोगों की मीटिंग हुई थी। वहीं पहली दफा हमारी मुलाकात हुई। इसके बाद मिलने-जुलने का सिलसिला चलता रहा।’

रमेश कहते हैं कि हमने शादी कर ली तो पत्नी के घरवाले मुझे धमकी देने लगे, मुझसे पैसे मांगने लगे।

रमेश कहते हैं कि हमने शादी कर ली तो पत्नी के घरवाले मुझे धमकी देने लगे, मुझसे पैसे मांगने लगे।

रमेश आगे कहते हैं- ‘सायरेली एसटी यानी आदिवासी समुदाय से है और मैं एससी हूं। मेरे परिवार को इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन लड़की के घरवालों ने मानने से इनकार कर दिया था। घर आकर धमकी देने लगे कि मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे। सायरेली के माता-पिता की पहले ही मौत हो चुकी है। एक भाई है, जो ओडिशा में नहीं रहता। सरकार से हजार रुपए की पेंशन मिलती थी, उसी से उसका घर चलता था।’

कुछ सोचकर रमेश कहते हैं- ‘जब हमने किसी को बिना बताए शादी कर ली, तो पत्नी के रिश्तेदार मेरे घर आ गए। धमकी दी और 5 लाख रुपए मांगने लगे। कहां से पैसे देता? खुद की जिंदगी कर्ज पर चल रही है। आखिर मैं उन्हें पैसे देता भी क्यों? मैंने कई बार पैसे देने से मना किया, लेकिन वो लोग नहीं माने। आखिर मैंने उन्हें 70 हजार रुपए दिए।’

अपने पैर की ओर इशारा करते हुए रमेश कहते हैं- ‘मैं तो चल भी नहीं सकता, कुछ काम नहीं कर पाता, पांच लाख रुपए कहां से ले आता। साल 2020 की बात है। काम करते वक्त मुझे बिजली का झटका लग गया था। दोनों हाथ बुरी तरह झुलस गए और एक पैर बेकार हो गया। जिस कंपनी के लिए काम करता था, उसने इलाज तक नहीं करवाया। जिस उम्र में मां-बाप का सहारा बनना था, आज उन्हीं मां-बाप की छाया में बच्चों की तरह जी रहा हूं। डेढ़ लाख रुपए का कर्ज है।

सरकार से हर महीने 3500 रुपए की दिव्यांग पेंशन मिलती है, उसी से जैसे-तैसे गुजारा कर रहे हैं। दोनों पति-पत्नी दिव्यांग हैं, जिंदगी जीना दुर्लभ है। ऊपर से सायलेरी की बिरादरी के लोगों ने जीना दुश्वार कर दिया।’

रमेश के बगल में 22 साल की सायलेरी माझी बैठी हैं। वो ठीक से हिंदी नहीं बोल पा रही हैं। उन्हें देखकर पहले से लग रहा था कि पैदाइशी दिव्यांग हैं। पूछने पर कहती हैं, ‘साल 2020 की बात है। एक रेल हादसे में मेरा एक पैर चला गया। अस्पताल से लौटकर घर आई, तो कोई देखने वाला नहीं था। बंद कमरे में पूरे दिन बिस्तर पर पड़ी रहती थी, कोई पूछने वाला नहीं था।

बारिश के मौसम की बात है। घर की छत टपक रही थी। मैं चारपाई पर लेटी थी, न चल सकती थी, न बैठ सकती थी। घर पर अकेली थी, भाई शहर गया हुआ था। मेरे देखते-देखते कुछ देर में कमरे में पानी भर गया। मैं टपकती छत को देखकर सोचती रही कि शायद कोई आ जाए मुझे देखने, लेकिन कोई नहीं आया। मैं हर आहट पर दरवाजा निहारती रही। उस दिन को आज तक भूल नहीं पाई।

सायरेली कहती हैं कि जब मुझे मदद की जरूरत थी तब कोई नहीं आया, शादी कर ली तो मेरे पति से पैसे मांगने लगे।

सायरेली कहती हैं कि जब मुझे मदद की जरूरत थी तब कोई नहीं आया, शादी कर ली तो मेरे पति से पैसे मांगने लगे।

सायरेली फफक कर रो पड़ीं। खुद को संभालते हुए बोलीं- ‘जब रमेश से मिली तो पहली बार ऐसा लगा कि कोई मुझे समझने वाला भी है। हमने शादी कर ली। जिन रिश्तेदारों ने कभी मेरा हाल नहीं पूछा, शादी के बाद वो सभी मेरे घर पहुंच गए। ससुरालवालों से कहा शुद्धिकरण के लिए 5 लाख रुपए दो, नहीं तो अंजाम भुगतना पड़ेगा। हमारे पास इतना पैसा नहीं था। रमेश ने ब्याज पर 70 हजार रुपए कर्ज लेकर मेरे रिश्तेदारों को दिया।’

दोनों परिवार से मिलने के बाद इस परंपरा को समझने के लिए मैं इस आदिवासी समाज के प्रमुख शिबराम माझी से मिलने पहुंची। वो कहते हैं, ‘जिस दिन ये सब हुआ, मैं गांव में नहीं था, जैसे ही सबको शादी के बारे में पता चला, सभी मुझे फोन करने लगे। हमारे समाज में जब कोई लड़की किसी दूसरी जाति के लड़के से शादी कर लेती है, तो समाज की परंपरा के अनुसार पूजा करनी पड़ती है- इसे हम ‘जाति मिलन पूजा’ कहते हैं, यहां हम आदिवासियों की आबादी करीब डेढ़ लाख है और सभी को शुद्धिकरण के लिए ऐसा ही करना होता है।’

शिबराम के मुताबिक इस पूजा में आदिवासी लोग, ग्राम देवता, धरती माता और घर की पूजा करते हैं। अगर कोई ये पूजा न करे, तो लड़की के पूरे परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। लोग उसके घर का पानी तक नहीं पीते। गांव में कोई भी अपनी बेटी उस घर में नहीं ब्याहता और न ही उस घर की दूसरी बेटियों से कोई शादी करता है। कोई भी उसके घर नहीं आता-जाता है।

मैंने शिबराम से पूछा, ‘क्या लड़की लौट आए तो आप लोग उसे स्वीकार करेंगे?’

‘सवाल ही नहीं उठता है। अब वो इस गांव की नहीं है। बाल कटवाना हमारी परंपरा का हिस्सा नहीं है। परिवार गुस्से में रहा होगा, इसीलिए सभी ने सिर मुंडवाए। जिस लड़की ने समाज की नाक कटवा दी, उसके लिए किस बात की रहमत। दूरी बनाकर परिवार ने अच्छा किया, नहीं तो समाज उस परिवार का त्याग कर देता।

ये कोई पहली बार नहीं हुआ है। हमारे आस-पास के गांव में भी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। 15 दिन पहले तबलीपूरा गांव में भी एक लड़की ने दूसरी जाति में शादी की थी, वहां भी जाति मिलन पूजा हुई थी।’

‘इसमें कितने पैसे लगे?’

शिबराम झेंपकर कहते हैं, ‘हमें नहीं पता। अगर लड़के वालों ने नहीं दिया होता, तो हमें अपनी जेब से करना पड़ता। इस समाज के सामने परंपरा से बचने का कोई रास्ता ही नहीं है। हमारे खानदान में ऐसा पहली बार हुआ है। हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारी बेटी इस रास्ते पर जाएगी।’

—————————————————

ब्लैकबोर्ड सीरीज की ये खबरें भी पढ़िए…

1- ब्लैकबोर्ड- पापा को मंदिर की सीढ़ियों से घसीटा, गाली दी:घर जला दिए, 26 साल से हम गांव जाने को तरस रहे

हम लोग दलित हैं मंदिर के अंदर तो क्या उसकी सीढ़ियां भी नहीं चढ़ सके। पापा बाहर से ही खड़े होकर दर्शन करने लगे। अचानक उन्हें किसी ने धक्का दिया और वो मंदिर की सीढ़ियों पर गिर पड़े। ये देखते ही मंदिर के पुजारी और आस-पास के लोग पापा को भद्दी गालियां देने लगे। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

2- ब्लैकबोर्ड-हमारी बेटी का रेप हुआ और हमें ही कैद मिली:जानवरों से बदतर जिंदगी जी रहे हैं, हमारे बच्चे स्कूल तक नहीं जा सकते

पिछले 5 साल से उस लड़की के घर पर सीआरपीएफ का पहरा है। इतना सख्त पहरा कि घर में आने-जाने वालों को सीआरपीएफ की परमिशन लेनी पड़ती है और रजिस्टर में एंट्री भी करनी होती है। गेट से पहले ही मेटल डिटेक्टर लगा है, इसी से आना-जाना होता है। घरवालों भी बिना परमिशन के चौखट के बाहर कदम नहीं रख सकते। चाहे कितनी ही बड़ी मुसीबत क्यों न आ जाए। यानी अपने ही घर में कैदी जैसी जिंदगी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

[ad_2]

Source link

अन्य खबरे

गोल्ड एंड सिल्वर

Our Visitors

498914
Total Visitors
error: Content is protected !!