Monday, February 26, 2024
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मूसलाधार बारिश व बाढ़ से नष्ट हुई फसल का तमाम किसानों के खातों में नहीं पहुंचा पैसा

 

 

 

 

  रिपोर्ट:वाइस एडिटर कृष्ण कुमार शुक्ल

रामनगर बाराबंकी। तहसील रामनगर के तराई क्षेत्र में सरयू घाघरा नदी की बाढ़ का दंश झेल रहे तराई के लगभग सैकड़ों किसानों मे आज भी मायूसी छाई हुई है।क्योंकि लगभग सभी किसानों की फसलें मूसलाधार बारिश व बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हो गई थी जिनमें आधे से कम किसानों को फसल नुकसान की रकम उनके खाते में भेज दी गई और लगभग आधे किसानों को आज तक किसी प्रकार की कोई फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हुई।जबकि उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा फसल नुकसान मुआवजे को लेकर हवाई सर्वेक्षण किया था और सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि पैसे की कोई कमी नहीं है सभी किसानों का जो भी नुकसान हुआ है बारिश से या बाढ़ से उन सभी किसानों को मुआवजा दिया जाएगा परंतु तहसील प्रशासन की लापरवाही से तमाम किसानों के खातों में ना तो बारिश से नष्ट हुई फसल का पैसा पहुंचा और ना ही बाढ़ से नष्ट हुई फसल का पैसा पहुंचा। हालांकि बैंक में केसीसी भी की जाती है और बीमा का पैसा काट लिया जाता है परंतु नष्ट हुई फसल का बैंक के द्वारा भी भुगतान नहीं किया गया जिससे हजारों किसान काफी परेशान है। कई किसानों का कहना है की बैंक ऑफ इंडिया या अन्य बैंकों में केसीसी कराते हैं और प्रतिवर्ष फसल बीमा का पैसा भी अकाउंट से काट लिया जाता है परंतु नष्ट हुई फसल का पैसा बीमा कंपनी खाते में नहीं भेजती है। गांव में जाकर लेखपालों द्वारा सत्यापन भी करवाया गया और उनके कागज भी जमा कराए गए जनपद में जिनमें कुछ किसानों के खातों में धान की फसल नुकसान होने का मुआवजा भी आ गया और कुछ किसान तहसील का चक्कर काटते रहे लेकिन उनके खाते में फूटी कौड़ी भी नहीं आई कई किसानों ने बताया कि जब हम तहसील जाते हैं तो लेखपाल द्वारा बताया जाता है कि जब प्रशासन द्वारा पैसा भेजा जाएगा तो आप लोगों के खातों में पहुंच जाएगा जितनी रकम दी गई थी उतनी किसानों के खेतों में भेज दी गई अब देखना है कि बाढ़ पीड़ित किसानों की खातों में रकम ना पहुंचने का कारण या तो लेखपालों द्वारा उनके नामों की फिडिंग नहीं कराई गई या उन्हें प्रशासन द्वारा धनराशि मिलने का इंतजार करने के लिए कहा जाता है यह कोई नई बात नहीं प्रत्येक वर्ष घाघरा की बाढ़ से किसान प्रभावित होते हैं कुछ लोगों को फसल का मुआवजा मिलता है और कुछ किसान सहारा लगाते हुए अंत में उम्मीद ही छोड़ देते हैं।

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