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अटल स्मृति में गूंजे ओज और व्यंग्य के स्वर, देर रात तक कविताओं पर झूमे साहित्यप्रेमी

रिपोर्ट/विवेक शुक्ला

रामनगर, बाराबंकी। भारत रत्न एवं पूर्व प्रधानमंत्री पंडित अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्य स्मृति में शनिवार को बुढ़वल चौराहा स्थित एक पैलेस में भाजपा नेता एवं समाजसेवी गौरीकांत दीक्षित के संयोजन में भव्य काव्य संध्या आयोजित हुई। कवि हर्ष प्रधान कार्यक्रम के संयोजक रहे। देर रात तक चले कार्यक्रम में देशभक्ति, राष्ट्रवाद, सामाजिक सरोकार और राजनीतिक व्यंग्य से ओतप्रोत रचनाओं ने श्रोताओं को बांधे रखा। कार्यक्रम का शुभारंभ विधान परिषद सदस्य अंगद सिंह, ब्लॉक प्रमुख संजय तिवारी एवं गौरीकांत दीक्षित ने मां भारती के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर दीप प्रज्ज्वलित करके किया। इस दौरान अंगद सिंह एवं गौरीकांत दीक्षित ने कवियों, पत्रकारों और विशिष्ट अतिथियों को अंगवस्त्र एवं लोधेश्वर महादेव का चित्र भेंटकर सम्मानित किया। हनुमानगढ़ी के महंत बाबा बलराम दास की मौजूदगी ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई। कार्यक्रम में गौरीकांत दीक्षित ने अपने संबोधन में साहित्य को समाज की चेतना और राष्ट्र की आत्मा बताया। उन्होंने पंडित अटल बिहारी वाजपेयी को याद करते हुए कहा कि अटल जी ने राजनीति को शब्दों की गरिमा, विचारों की ऊंचाई और राष्ट्रसेवा के संकल्प से नई पहचान दी। उन्होंने कहा कि अटल जी की कविताएं आज भी देशवासियों में राष्ट्रभक्ति और सकारात्मक सोच का संचार करती हैं। गौरीकांत दीक्षित ने कहा कि “जहां साहित्य और संस्कृति का सम्मान होता है, वहां समाज की जड़ें मजबूत होती हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और अपने महापुरुषों के विचारों से जोड़ें। उनके संबोधन पर श्रोताओं ने तालियों से जोरदार स्वागत किया।कवयित्री दिव्यांशी अवस्थी ने मां सरस्वती की वंदना से काव्य संध्या का आगाज किया और सुनाया भावनाओं का हमारी अंत होता जा रहा है,मन कहीं लगता नहीं, वो संत होता जा रहा है।कवि प्रमोद पंकज ने अपनी पंक्तियों से साहित्यिक रंग जमाते हुए कहा शब्द गढ़ते तो तुलसी के पुजारी बन गए होते,सूर के सिंधु के तरे के प्रभारी बन गए होते। जान्हवी ओझा ने वीर रस से ओतप्रोत पंक्तियां सुनाईं उन शहीदों का बल मूल बन जाऊं मैं,राह में पैर की धूल बन जाऊं मैं। ईशा मिश्रा ने आध्यात्मिक भावों से श्रोताओं को भावविभोर करते हुए कहा राह गलत यदि होगी तो फिर धाम नहीं मिल पाएंगे,मीरा सा प्रण न होगा तो श्याम नहीं मिल पाएंगे।”कवि शिवेश राजा ने ओजपूर्ण अंदाज में कहा जब-जब पितामह अन्याय के संग में दिखेंगे,तब-तब कवि तलवार से कविता लिखेंगे।” वहीं विशाल मिश्रा ने यूजीसी बिल पर व्यंग्य करते हुए राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष किया। रजत कुमार मिश्रा ने पेपर लीक के मुद्दे को कविता के माध्यम से उठाते हुए कहा कि व्यवस्था दुरुस्त हो तो ऐसी घटनाओं पर रोक लग सकती है।कमल कांत तिवारी ने देश और राजनीति को लेकर चेताते हुए सुनाया कह दो भारत की संसद से और सियासत घरों से,जंग नहीं जीती जाती है जंग लगे हथियारों से। संदीप कटियार ने व्यंग्यात्मक अंदाज में सुनाया अब ये झूठा रस रचाना बंद करो,कालनेमि सी भक्ति दिखाना बंद करो।”इसके अलावा रणधीर सिंह, हर्ष प्रधान सहित अन्य कवियों ने अपनी प्रभावशाली रचनाओं से देर रात तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध रखा। कार्यक्रम का कुशल संचालन नीरज निर्मोही ने किया।इस अवसर पर रविकांत पांडेय, पवन ओझा बल्लू बाबा सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, गणमान्य नागरिक और श्रोता मौजूद रहे। देर रात तक तालियों और वाहवाही से काव्य संध्या का परिसर गूंजता रहा।

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