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राष्ट्र का चौथा स्तंभ: नाम बड़ा, पर क्या काम भी वैसा ही

रिपोर्ट/नारद संवाद एजेंसी

बाराबंकी। लोकतंत्र में पत्रकारिता को राष्ट्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, जिसका मूल उद्देश्य निष्पक्षता, निर्भीकता और जनहित को सर्वोपरि रखते हुए सत्ता और समाज के बीच सेतु का कार्य करना है। हालांकि बदलते दौर में पत्रकारिता की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर कई तरह के दबाव देखने को मिल रहे हैं।जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया (रजि.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुराग सक्सेना ने एक गोष्ठी में कहा कि वर्तमान समय में बहुत कम पत्रकार और मीडिया संस्थान अपने मूल दायित्वों का पूरी निष्ठा से निर्वहन कर पा रहे हैं। उनके अनुसार राजनीतिक दबाव, आर्थिक निर्भरता, विज्ञापनों की मजबूरी, मुकदमों और धमकियों जैसी परिस्थितियां पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित कर रही हैं।उन्होंने कहा कि आज का पत्रकार सत्य को सामने लाने के साथ-साथ संस्थागत दबावों, आर्थिक असुरक्षा और व्यक्तिगत जोखिमों से भी जूझ रहा है। इसके बावजूद अनेक पत्रकार कठिन परिस्थितियों में भी निष्पक्ष और जनहितकारी पत्रकारिता का दायित्व निभा रहे हैं।डॉ. सक्सेना ने कहा कि पत्रकारिता का संकट केवल मीडिया का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का संकट है। इसलिए आवश्यक है कि पत्रकारिता अपने मूल मूल्य—सत्य, निष्पक्षता, साहस और जनहित—की ओर लौटे तथा पत्रकारों को सुरक्षित और स्वतंत्र वातावरण उपलब्ध कराया जाए, ताकि लोकतंत्र का यह महत्वपूर्ण स्तंभ अपनी गरिमा और जिम्मेदारी के साथ समाज की सेवा करता रहे।

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