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बड़ी धूम धाम से मनाई गई भगवान श्री कृष्ण की जन्माष्टमी पढ़े पूरी कथा

 

सभी देवताओं को पूजने वाले गृहस्थ आश्रम के लोगो ने छ सितंबर को जन्माष्टमी मनाया वही, वैष्णव धर्म के लोगों ने सात सितंबर को श्री कृष्ण जन्माष्टमी मनाया

रिपोर्ट/कृष्ण कुमार शुक्ल/अंजनी अवस्थी

रामनगर बाराबंकी।भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार द्वापर युग में भाद्रपद मास के अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र में काली घटाओं के बीच घनघोर बारिश में अर्द्धरात्रि को मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के अष्टम संतान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म हुआ। भगवान श्री कृष्ण ने कंस सहित तमाम पापियों का संहार किया । बाराबंकी जिले की तहसील रामनगर के तमाम मंदिरों व घरों में अबकी बार 6 व 7 सितंबर को श्री कृष्ण जन्मोत्सव मनाया गया । भजन कीर्तन करते हुए रात्रि को 12:00 बजे शंख ध्वनि के साथ श्री कृष्ण का जन्मोत्सव होने पर सोहर आदि गीतों को भी गाया ।रामनगर के कस्बा गणेशपुर के ठाकुरद्वारा मंदिर, महादेवा के लोधेश्वर महादेव मंदिर, ठाकुरद्वारा रानीगंज ,राम जानकी मंदिर रामनगर ,रामेश्वर महादेव मंदिर रामनगर ,ऋषिआश्रम कुरूक्षेत्र,व अमोली कला में कृष्ण जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम के साथ मनाया गया। 

बता दे श्री कृष्ण जन्म अष्टमी के पावन अवसर पर पूरे भारत सहित विश्व में इनकी कथा को सुनते है जो इस प्रकार है ‘द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी राजकुमार से हुआ था।एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था।रास्ते में आकाशवाणी हुई- ‘हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।’यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ।तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- ‘मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?तब कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया।उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया।

 वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे पैदा हुए और सातों को जन्म लेते ही राक्षस कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए।उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था।

 उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ ‘माया’ थी।जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे,उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- ‘अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।

 तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।’उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए।अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है।उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- ‘अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो गोकुल में जा पहुंचा है।वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।’

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