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हैदरगढ़ में अपराधियों पर पुलिस संरक्षण के आरोप, CO समीर सिंह की भूमिका पर गंभीर सवाल!

अपराध बढ़े तो जवाबदेही किसकी? CO की कार्यशैली की उच्चस्तरीय जांच और कार्रवाई की उठी मांग!

रिपोर्ट:- राघवेन्द्र मिश्रा (एडिटर)

हैदरगढ़:-  सरकार अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का दावा कर रही है, लेकिन हैदरगढ़ सर्किल में लगातार सामने आ रही आपराधिक घटनाओं ने पुलिस व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थानीय लोगों और पीड़ित पक्षों की ओर से अपराधियों को पुलिस संरक्षण मिलने जैसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों की सच्चाई क्या है, यह जांच का विषय है, लेकिन यदि शिकायतों में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला बेहद गंभीर है और संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई आवश्यक होनी चाहिए।

CO समीर सिंह की कार्यशैली पर क्यों उठ रहे सवाल?

आरोप है कि क्षेत्र में पुराने मुकदमों और वारंटों में वांछित आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो रही है। वहीं, गंभीर घटनाओं के बाद पुलिस की भूमिका और कार्रवाई को लेकर भी पीड़ित परिवारों द्वारा सवाल उठाए गए हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर अपराधियों को पुलिस का भय नहीं है तो आखिर इसके पीछे वजह क्या है?

क्या पुलिस की कार्रवाई में कहीं लापरवाही है?

क्या प्रभावशाली लोगों के दबाव में कार्रवाई प्रभावित हो रही है?

क्या कुछ मामलों में पुलिस संरक्षण के आरोपों की जांच हुई?

और क्या CO स्तर से की गई विवेचनाओं की निष्पक्ष समीक्षा कराई गई?

फर्जी SC/ST मुकदमों और चार्जशीट के आरोपों की भी हो जांच !

कुछ पीड़ित पक्षों द्वारा SC/ST एक्ट सहित अन्य मुकदमों की विवेचना और चार्जशीट प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को गलत तरीके से मुकदमे में फंसाने या जांच प्रभावित करने के आरोप सामने आए हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच क्यों न कराई जाए?

पुलिस के पास जांच की ताकत है, लेकिन उसी ताकत का इस्तेमाल यदि किसी निर्दोष को दबाने या किसी प्रभावशाली व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया हो तो यह व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर विषय है।

अब कप्तान से लेकर उच्चाधिकारियों तक जांच की मांग!

हैदरगढ़ क्षेत्र में लगातार हो रही घटनाओं और सामने आ रहे आरोपों को देखते हुए मांग उठ रही है कि—

◆ CO समीर सिंह की कार्यशैली की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

◆ गंभीर मामलों की विवेचनाओं का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए।

◆ पुराने वारंटों और वांछित अपराधियों की गिरफ्तारी की समीक्षा हो।

◆ पुलिस संरक्षण के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

◆ यदि आरोप सही पाए जाएं तो जिम्मेदार अधिकारियों/कर्मचारियों पर कठोर विभागीय कार्रवाई हो।

◆ किसी निर्दोष को फर्जी मुकदमे में फंसाने के आरोप सही पाए जाने पर भी जिम्मेदारी तय की जाए।

सवाल सीधा है—अपराधियों पर शिकंजा कसेगा या सिर्फ कागजों में कार्रवाई होगी?

अब नजर पुलिस अधीक्षक बाराबंकी और उच्च पुलिस अधिकारियों पर है कि वे इन गंभीर आरोपों का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराते हैं या नहीं। साथ ही अपराधियों पर अंकुश लगाने के लिए क्या नया तरीका अपनाएंगे।

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