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India Vs Nepal Protest Violence; Hindu Rashtra | Pro Monarchy | आज का एक्सप्लेनर: क्या हिंदू राष्ट्र बनेगा नेपाल, लौटेगा राजा-रजवाड़ों का दौर; क्यों हो रहे हिंसक प्रदर्शन और भारत की क्या भूमिका


नेपाल में राजशाही को वापस लाने और हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। इसमें दो लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हैं। 2008 में नेपाल एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना था। उसके बाद अब तक 17 सालों में 14 सरकारें बन चुकी हैं।

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नेपाल में राजशाही और हिंदू राष्ट्र की मांग क्यों उठ रही, क्या अब ऐसा संभव है, इसके पीछे कौन लोग और भारत की क्या भूमिका है; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…

सवाल-1: नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने और राजशाही की मांग करने वाले कौन हैं?

जवाब: नेपाल में राजशाही बहाल करने की मांग होती रही है। इसकी ताजा शुरुआत 9 मार्च 2025 को हुई। जब काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर करीब 10 हजार लोग इकट्ठा हुए। ये सभी नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के समर्थक थे।

ज्ञानेंद्र पश्चिमी नेपाल के दौरे से वापस लौटे तो हजारों समर्थकों ‘रॉयल पैलेस खाली करो, राजा आ रहे हैं’, ‘वापस आओ राजा, देश बचाओ’ और ‘हम राजशाही चाहते हैं’ जैसे नारे लगाने लगे।

पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह पश्चिम नेपाल के दौरे से 2 महीने के प्रवास के बाद 9 मार्च को काठमांडू लौटे थे। तब उनका हजारों लोगों ने स्वागत किया था।

पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह पश्चिम नेपाल के दौरे से 2 महीने के प्रवास के बाद 9 मार्च को काठमांडू लौटे थे। तब उनका हजारों लोगों ने स्वागत किया था।

इस दौरान कोई हिंसक घटना नहीं हुई, लेकिन हिंसा की चिंगारी जरूर भड़क गई। नतीजतन, 28 मार्च को हिंसक प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हो गई।

तिनकुने में एक इमारत में तोड़फोड़ की और उसे आग के हवाले कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर भी फेंके, जिसके जवाब में सुरक्षाकर्मियों को आंसू गैस के गोले दागने पड़े। इस घटना में दो लोगों की मौत भी हो गई।

प्रदर्शन राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेतृत्व में हो रहा था, जिसे नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह का समर्थन हासिल है। नेपाल में इस हिंसक झड़प के लिए लोकतंत्र समर्थक पार्टियों ने पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह को जिम्मेदार ठहराया है।

नेपाल में प्रदर्शनकारियों की 2 प्रमुख मांगें हैं…

1. राजशाही व्यवस्था की बहाली: लोगों की मांग है कि देश में राजनीतिक प्रक्रिया खत्म करके राजशाही को दोबारा लागू किया जाए। राजशाही व्यवस्था नेपाल का केंद्रीय मुद्दा है, जो 2008 में गणतंत्र की स्थापना के बाद से ही शुरू हो गया था।

2. हिंदू राष्ट्र की मांग: नेपाल की करीब 81% हिंदू आबादी की मांग है कि देश को हिंदू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए, जैसा कि राजशाही के समय था। समर्थकों का मानना है कि 2008 में धर्मनिरपेक्षता अपनाने से नेपाल की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान कमजोर हुई है।

काठमांडू में विरोध प्रदर्शन के दौरान दिवंगत राजा महेंद्र शाह की तस्वीर लेकर राजशाही का समर्थन करती महिला।

काठमांडू में विरोध प्रदर्शन के दौरान दिवंगत राजा महेंद्र शाह की तस्वीर लेकर राजशाही का समर्थन करती महिला।

सवाल-2: नेपाल में राजशाही को बहाल करने की मांग क्यों हो रही?

जवाब: नेपाल में राजशाही को बहाल करने की मांग के पीछे 5 बड़ी वजहें बताई जा रही हैं…

  1. कई लोगों को लगता है कि लोकतंत्र में नेताओं के आपसी टकराव, भ्रष्टाचार, और शासन में अनबन ने देश को कमजोर किया है। पिछले 17 सालों में नेपाल में 13 बार सरकारें बदल चुकी हैं। किसी भी सरकार ने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया। ऐसे में लोगों का सरकार की व्यवस्था से भरोसा उठ गया।
  2. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक साल में नेपाल में भ्रष्टाचार 58% बढ़ गया। 50% भ्रष्टाचार के मामले प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति कार्यालय से जुड़े लोगों या संगठनों से संबंधित हैं।
  3. राजशाही के समर्थकों का मानना है कि राजा के शासन में भ्रष्टाचार कम होगा। राजशाही में राजा और उसके परिवार को पहले से ही सरकार से अच्छी पेंशन और सुविधाएं मिलती हैं, इसलिए उन्हें कम वेतन वाले सरकारी कर्मचारियों की तरह रिश्वत लेने की जरूरत नहीं होगी।
  4. राजशाही हटने के बाद से नेपाल की GDP की रफ्तार थमी है और ट्रेड डेफिसिट बढ़ा है। 2008 से पहले नेपाल नेपाल 2 रुपए का समान इम्पोर्ट करता था तो 1 रुपए के सामान एक्सपोर्ट करता था। आज ये रेश्यो 12:1 का हो गया है।
  5. नेपाल सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में देश में बेरोजगारी दर 12.6 % रही। यानी 2018 से 2023 तक देश की बेरोजगारी दर में 1.2% का इजाफा हुआ। 2023 में एवरेज हर महीना 65 हजार युवाओं ने देश छोड़ा और काम की तलाश में बाहर गए। 3 करोड़ आबादी वाले देश के लिए यह बहुत बड़ा नंबर है।

राजशाही समर्थकों का मानना है कि संसद में अलग-अलग राजनीति दलों में मतभेद के कारण देश का विकास नहीं हो रहा। एक बंटी हुई संसद आमतौर पर कोई एकतरफा फैसला नहीं ले सकती है। वहीं, एक राजा तेजी और अकेले किसी भी फैसले को आसानी से ले सकता है।

काठमांडू में विरोध प्रदर्शन के दौरान राजशाही समर्थकों ने घर में आग लगा दी, जिसके बाद पुलिस ने इलाके को सील कर दिया।

काठमांडू में विरोध प्रदर्शन के दौरान राजशाही समर्थकों ने घर में आग लगा दी, जिसके बाद पुलिस ने इलाके को सील कर दिया।

सवाल-3: अगर नेपाल में राजशाही लौट आई तो क्या लोकतंत्र खत्म हो जाएगा?

जवाब: राजशाही दो तरह की होती है…

निरंकुश राजशाही: राजा या रानी के पास विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियां होती हैं। उनकी इच्छा ही कानून मानी जाती है। वे कानून बनाने, शासन चलाने और न्याय देने योग्य होते हैं। इसमें संसद, संविधान या जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की कोई भूमिका नहीं होती जो राजा की शक्तियों को सीमित कर दे। कई निरंकुश राजशाहियों में शासक दावा करते हैं कि उनकी शक्ति ईश्वर से प्राप्त है, जिससे उनकी सत्ता को चुनौती देना पाप या अपराध माना जाता है।

संवैधानिक राजशाही: इस शासन व्यवस्था में राजा या रानी देश का शासक होता है, लेकिन उसकी शक्तियां संविधान या कानून के दायरे तक सीमित होती हैं। इस व्यवस्था में राजा या रानी प्रतीकात्मक या औपचारिक भूमिका निभाते हैं, जबकि असल शासन लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार और संसद के पास होता है। जापान, ब्रिटेन और थाईलैंड जैसे देशों में ऐसी व्यवस्था है।

NEHU के प्रोफेसर और विदेश मामलों के जानकार प्रसेनजीत बिस्वास का कहना है, ‘अगर नेपाल में राजशाही लौटती है तो भी लोकतंत्र खत्म नहीं होगा। लोकतंत्र खत्म होने का मतलब है कि देश में निरंकुश राजशाही। जो फिलहाल नेपाल में लग पाना असंभव लग रहा है।’

सवाल-4: नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग क्या है और कहां से उठी?

जवाब: नेपाल लंबे समय तक दुनिया का इकलौता आधिकारिक हिंदू राष्ट्र था। 1768 में पृथ्वी नारायण शाह द्वारा नेपाल के एकीकरण के बाद से यहां की राजशाही ने हिंदू धर्म को राज्य धर्म के रूप में बढ़ावा दिया। 1950 के बाद यहां ईसाई आबादी बढ़ना शुरू हुई।

माओवादी आंदोलन और जनआंदोलन के बाद राजशाही का अंत हुआ। 28 मई 2008 को नवनिर्वाचित संविधान सभा ने नेपाल को एक सेकुलर देश बनाने का फैसला लिया। 2021 की जनगणना के अनुसार, नेपाल की लगभग 81.2% आबादी हिंदू हैं।

वर्ल्ड क्रिश्चियन डेटाबेस की रिपोर्ट के मुताबिक, क्रिश्चिएनिटी दुनियाभर में नेपाल का सबसे तेजी से बढ़ने वाला धर्म बन चुका है। इसको लेकर राजशाही समर्थकों ने ज्ञानेंद्र शाह के समर्थन से हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग शुरू कर दी।

राजशाही और हिंदू राष्ट्र के लिए हो रहे प्रदर्शन में पूर्व नरेश के साथ यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के भी पोस्टर लहराए गए।

राजशाही और हिंदू राष्ट्र के लिए हो रहे प्रदर्शन में पूर्व नरेश के साथ यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के भी पोस्टर लहराए गए।

सवाल-5: क्या राजशाही के साथ हिंदू राष्ट्र का मुद्दा उठाकर भारत से समर्थन पाने की कोशिश है?

जवाबः JNU के प्रोफेसर और विदेश मामलों के जानकार राजन कुमार कहते हैं,

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नेपाल के प्रदर्शनकारी हिंदुत्व का मुद्दा उठाकर वहां की 80% से ज्यादा हिंदू आबादी का समर्थन हासिल करना चाहते हैं। उनका मानना है कि यह सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी को कमजोर करने की एक रणनीति भी हो सकती है। धर्म का मुद्दा उठने पर लोग लोकतांत्रिक मूल्यों और सेक्युलरिज्म को भूल जाते हैं। हालांकि सत्ताधारी पार्टी इसे कभी लागू नहीं होने देगी।

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प्रो. राजन के अनुसार, भारत कभी भी नेपाल में राजशाही का समर्थन नहीं करेगा। भारत में कुछ संगठन इस मुद्दे का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन सरकार ऐसा नहीं करेगी। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत खुद को लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाले देश के रूप में देखना चाहता है।

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने आदित्यनाथ के पोस्टर दिखने की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि देश में ऐसी स्थिति नहीं आनी चाहिए कि विरोध प्रदर्शन के लिए किसी विदेशी नेता की तस्वीर की जरूरत पड़े।

सवाल-6: क्या नेपाल में राजशाही लौटना और हिंदू राष्ट्र बनना मुमकिन है?

जवाब: विदेश मामलों के जानकार प्रो. प्रसेनजीत बिस्वास का कहना है, ‘नेपाल में राजशाही लौटना मुमकिन नहीं लगता, क्योंकि राजशाही का दौर पूरी तरह से खत्म हो गया है। बहुसंख्यक जनता ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपना लिया है, इसलिए फिलहाल हिंदू राष्ट्र बनना भी संभव नहीं।’

प्रो. प्रसेनजीत मानते हैं,

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नेपाल में बहुत सारी जनजातियां, ट्राइबल कम्यूनिटीज और शहरी लोगों का समर्थन सत्तारूढ़ सरकार के साथ है। थोड़ी-बहुत खामियां, भ्रष्टाचार और उतार-चढ़ाव तो हर देश की सरकार में होते हैं। नेपाल में मौजूदा विरोध सिर्फ कुछ मुट्ठीभर लोगों कर रहे हैं, जो राजशाही के वफादार हैं और इनके विरोध से कोई नतीजा नहीं निकलेगा।

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