रिपोर्ट/विवेक शुक्ला
रामनगर (बाराबंकी)। सूरतगंज क्षेत्र के गौराचक में आयोजित पांच दिवसीय श्रीराम कथा के दूसरे दिन शनिवार को कथा व्यास चंद्रशेखर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को लंका कांड का विस्तृत वर्णन सुनाया। पंडाल में उपस्थित श्रोताओं ने कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण किया।कथा व्यास ने बताया कि भगवान श्रीराम द्वारा रामेश्वरम में शिव पूजन, सेतु बंध, लंका प्रवेश, लक्ष्मण मूर्छा, मेघनाथ वध तथा रावण वध की घटनाएं मानव जीवन को धर्म, संयम और भक्ति का संदेश देती हैं। उन्होंने कहा कि संत स्वभाव का नाम है, शरीर का नहीं। जिससे मिलकर मन शांत, शीतल, प्रसन्न और चिंतामुक्त हो जाए तथा दुर्गुणों का त्याग कर भगवान के भजन की प्रेरणा मिले, वही सच्चा संत है।कथा के क्रम में उन्होंने बताया कि लंका दहन के बाद हनुमान जी सीता माता से चूड़ामणि लेकर श्रीराम के पास पहुंचे और अशोक वाटिका का समाचार सुनाया। सीता माता के दुख को सुनकर भगवान राम ने अपनी सेना को लंका प्रस्थान का आदेश दिया तथा समुद्र तट पर रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर पूजा की।उन्होंने कहा कि भगवान स्वयं राक्षसों के उद्धार के लिए लंका पहुंचे, क्योंकि जो मन से प्रभु का स्मरण करता है, भगवान स्वयं उसके पास पहुंचते हैं। कथा व्यास ने रावण की सभा का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि विभीषण ने सीता को लौटाने की सलाह दी, किंतु रावण ने क्रोधित होकर उन्हें अपमानित कर दिया। इसके बाद विभीषण श्रीराम की शरण में पहुंच गए।महाराज ने कहा कि मेघनाथ काम का प्रतीक है और काम को संयम से ही जीता जा सकता है, भोग से नहीं। उन्होंने इसे उर्मिला और सुलोचना के पतिव्रत धर्म की विजय का भी प्रतीक बताया।इस अवसर पर रामफेर, केशवराम, रामकुवारे, बब्लू, अनंतराम, राममिलन, रामे, कुट्टू, साधुराम, अभिषेक, ओमकार, सूरज, अमरेश सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।































