दिल्ली :- E20 पेट्रोल को लेकर देशभर में वाहन मालिकों की चिंता बढ़ रही है। आम उपभोक्ता का सवाल साफ है जब कार और बाइक E5 या E10 के हिसाब से बनी थीं, तो उन्हें अचानक E20 पर चलाने के लिए मजबूर क्यों किया गया?
सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियां दावा कर रही हैं कि E20 से बड़े पैमाने पर इंजन डैमेज का कोई सबूत नहीं है। लेकिन यही सरकार और इंडस्ट्री यह भी मान रही है कि E20 से माइलेज घटता है, क्योंकि इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है। हालिया बयान में इंडस्ट्री ने करीब 3 से 3.5% माइलेज ड्रॉप की बात मानी है।
उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि पेट्रोल पंप पर उन्हें विकल्प नहीं दिया गया। कई पुराने वाहनों के मैनुअल में E5 या E10 तक की अनुमति लिखी है, लेकिन देशभर में E20 ही उपलब्ध कराया जा रहा है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में E10/E5 जैसे कम इथेनॉल वाले विकल्प कई जगह बंद हो गए, जबकि ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों में ग्राहकों को अलग-अलग fuel blend चुनने का विकल्प मिलता है।
अब बड़ा सवाल ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री पर है। जब सरकार ने E20 का रोडमैप पहले ही तय कर दिया था, तो कंपनियों ने पहले से पूरी तरह E20-ready engine, fuel pipe, gasket, injector और warranty protection क्यों नहीं दिया? अगर ग्राहक का माइलेज घट रहा है, maintenance बढ़ रहा है या पुराने वाहन में compatibility का डर है, तो इसका बोझ सिर्फ उपभोक्ता क्यों उठाए?
सरकार कह रही है कि E20 से तेल आयात घटेगा, किसानों को फायदा होगा और प्रदूषण कम होगा। लेकिन ग्राहक पूछ रहा है, देशहित के नाम पर मेरी जेब से अतिरिक्त पेट्रोल खर्च क्यों? अगर माइलेज घटा है तो पेट्रोल की कीमत में राहत क्यों नहीं? अगर पुराने वाहनों को पार्ट बदलने हैं तो उसका खर्च कंपनी या सरकार क्यों नहीं दे रही?