भाजपा के पूर्व सांसद ब्रज भूषण शरण सिंह ने 15 अक्टूबर, 2026 को उन्नाव में एक कार्यक्रम के दौरान भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति का बचाव किया। उन्होंने इस नियुक्ति की प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों और आलोचनाओं का जवाब दिया।
सिंह ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2023 से पहले इस तरह की नियुक्तियों के लिए कोई औपचारिक और स्थापित प्रक्रिया मौजूद नहीं थी। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद एक व्यवस्थित नीति तैयार की गई।
उनके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक नई प्रणाली लागू की गई है। इसी नई व्यवस्था के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन किया गया है।
नियुक्ति की कानूनी प्रक्रिया और चयन समिति
ब्रज भूषण शरण सिंह ने बताया कि अब नियुक्तियां ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023’ के तहत होती हैं। इस कानून के तहत एक चयन समिति बनाई गई है जो उम्मीदवारों का चुनाव करती है।
इस चयन समिति की संरचना के बारे में उन्होंने विस्तार से जानकारी दी। इस समिति में निम्नलिखित सदस्य शामिल होते हैं:
- प्रधानमंत्री, जो समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।
- लोकसभा में विपक्ष के नेता।
- प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री।
सिंह ने जोर देकर कहा कि ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी, 2025 को अपना पद संभाला था। उनकी नियुक्ति पूरी तरह से इसी कानूनी ढांचे और वैधानिक नियमों के आधार पर की गई है।
विपक्ष पर हमला और दिल्ली के विरोध प्रदर्शन
पूर्व सांसद ने विपक्ष को चुनौती देते हुए कहा कि यदि उन्हें इस नियुक्ति पर कोई आपत्ति है, तो वे ठोस सबूत पेश करें। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसी शिकायतों का समाधान सुप्रीम कोर्ट में किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शनों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि इन आंदोलनों को विदेशी ताकतों का समर्थन मिल रहा है। सिंह के मुताबिक, इन गतिविधियों का असली मकसद देश को अस्थिर करना है।
कानून में बदलाव और सुप्रीम कोर्ट का फैसला
उन्होंने जानकारी दी कि 2023 का यह अधिनियम अब चुनाव आयोग अधिनियम, 1991 की जगह ले चुका है। इस नए कानून के तहत कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक सर्च कमेटी बनाई जाती है, जो चयन समिति के विचार के लिए नामों का एक पैनल प्रस्तावित करती है।
यह पूरा विधायी बदलाव सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2023 के ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ’ फैसले के बाद आया। इस फैसले में कोर्ट ने सुझाव दिया था कि जब तक संसद कानून नहीं बना लेती, तब तक चयन प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाना चाहिए।

























