दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को वोटर लिस्ट के विशेष गहन संशोधन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे 100 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया। ये प्रदर्शनकारी गोले डाक खाना इलाके से अशोक रोड स्थित भारत निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की ओर मार्च करने की कोशिश कर रहे थे।
इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन को तुरंत रद्द करने की मांग करना था। साथ ही प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी उठाई।
प्रदर्शन के दौरान लोग हाथों में तिरंगा और विभिन्न बैनर लेकर चल रहे थे। वे वर्तमान चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ जमकर नारेबाजी कर रहे थे। प्रशासन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू कर दी थी, जिसके कारण बांगला साहिब गुरुद्वारे के पास ही मार्च को रोक दिया गया।
प्रदर्शन का संगठन और समर्थन
इस आयोजन के पीछे ‘पीपल्स अगेंस्ट एसआईआर’ की दिल्ली समन्वय समिति थी। इस समिति का गठन अक्टूबर 2026 के मध्य में सुरजीत भवन में किया गया था।
इस मार्च को कई अलग-अलग समूहों का समर्थन मिला। इसमें शामिल प्रमुख संगठन और समूह इस प्रकार हैं:
- संयुक्त किसान मोर्चा
- विभिन्न ट्रेड यूनियन
- AISA जैसे छात्र संगठन
- विभिन्न वामपंथी पार्टियां
वोटर लिस्ट संशोधन की प्रक्रिया और आंकड़े
वोटर लिस्ट की सटीकता की जांच के लिए 2025 के दौरान चरणों में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन शुरू किया गया था। भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, इस प्रक्रिया का मकसद मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके लोगों, डुप्लिकेट नामों और उन लोगों को हटाना है जिनका पता नहीं लगाया जा सका है।
विभिन्न रिपोर्टों में दिए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, पहले तीन चरणों के दौरान लगभग 13.39 करोड़ नामों को अनुपस्थित, शिफ्टेड, मृत या डुप्लिकेट श्रेणियों में रखा गया। भारत निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े ड्राफ्ट स्टेज की मार्किंग हैं, अंतिम तौर पर नाम हटाना नहीं।
आयोग ने यह भी कहा कि पात्र मतदाताओं के पास यह अधिकार है कि वे अपने नाम गलत तरीके से हटाए जाने पर दावा या आपत्ति दर्ज कराकर उसे वापस पा सकें। वहीं अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला के स्वतंत्र विश्लेषण का सुझाव है कि बिना स्पष्ट कारण के हटाए गए नामों की संख्या 13 करोड़ के आंकड़े से काफी कम है। उनका तर्क है कि यह वर्गीकरण डेटा की वैध सफाई का हिस्सा है।
विवाद और प्रशासनिक खामियां
कॉकरोच जनता पार्टी और कई विपक्षी नेताओं का आरोप है कि यह प्रक्रिया कुछ खास समुदायों को ज्यादा प्रभावित कर रही है। उनका दावा है कि यह संशोधन वास्तव में वैध मतदाताओं को हटाने की एक राजनीतिक साजिश है। टाइम्स ऑफ इंडिया और अन्य मीडिया संस्थानों ने बताया है कि प्रशासनिक मशीनरी के भीतर भी इन संशोधनों को लेकर असहमति देखी गई है।
डेटा क्वालिटी की समस्या ने स्थिति को और जटिल बना दिया है, खासकर उत्तर प्रदेश में। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने हाल ही में 158 प्रविष्टियों की जांच के आदेश दिए हैं। सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी की वजह से विधान परिषद की वोटर लिस्ट में नामों का अजीबोगरीब अनुवाद हो गया था, जिसमें एक नाम का अनुवाद हिंसक वाक्यांश के रूप में हो गया।
यह समस्या कुल 14.81 लाख प्रविष्टियों के बीच आई, जिससे डिजिटल वोटर लिस्ट तैयार करने में मानवीय निगरानी की कमी पर सवाल खड़े हो गए। हालांकि, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने वोटर लिस्ट की शुद्धता बनाए रखने के लिए स्पेशल इंटेंसिव रिविजन करने के निर्वाचन आयोग के अधिकार को बरकरार रखा है।
कानूनी समर्थन के बावजूद, प्रदर्शनकारियों ने 1 नवंबर तक 18 राज्यों में प्रदर्शन जारी रखने का संकल्प लिया है, जिसमें 145 से अधिक संगठन शामिल होंगे। निर्वाचन आयोग ने बूथ स्तर के अधिकारियों को उन पात्र मतदाताओं के पुन: सत्यापन को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है जिनके नाम लिस्ट से छूट गए थे। भविष्य में राज्य-विशिष्ट फाइनल रोल और वार्षिक स्पेशल समरी रिविजन के अपडेट से पता चलेगा कि भारतीय मतदाताओं पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा।































