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भारत में 2029 से लागू होंगे BS VII उत्सर्जन मानक, सरकार ने जारी किया ड्राफ्ट प्रस्ताव

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने मोटर वाहनों के लिए भारत स्टेज VII (BS VII) उत्सर्जन मानकों को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का आधिकारिक प्रस्ताव दिया है। यह नई व्यवस्था 1 अप्रैल 2029 से शुरू करने की योजना है।

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इस नियामक बदलाव का मुख्य उद्देश्य भारतीय वाहन मानकों को वैश्विक Euro 7 मानकों के अनुरूप बनाना है। सरकार के माध्यम से इस कदम को शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण को कम करने की एक कोशिश माना जा रहा है।

13 अक्टूबर 2026 के आसपास जारी किए गए प्रस्ताव के अनुसार, ये नियम सबसे पहले पैसेंजर वाहनों पर लागू होंगे। इसके बाद अन्य श्रेणियों के वाहनों को इसमें शामिल किया जाएगा।

विभिन्न वाहनों के लिए लागू होने की समयसीमा

प्रस्ताव के मुताबिक, हल्के वाणिज्यिक वाहनों (Light Commercial Vehicles) को साल 2030 तक इन मानकों के दायरे में लाया जाएगा। भारी वाहनों (Heavy Duty Vehicles) के लिए मानक साल 2031 से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।

सभी श्रेणियों के वाहनों के लिए पूर्ण कार्यान्वयन अप्रैल 2035 तक होने की उम्मीद है। Times of India, The Hindu, Financial Express, Business Standard और BusinessToday की रिपोर्टों ने पुष्टि की है कि सरकार अब इन ड्राफ्ट नोटिफिकेशन्स पर जनता से सुझाव मांग रही है।

इस प्रक्रिया के तहत संबंधित हितधारकों को ड्राफ्ट नियमों पर अपनी प्रतिक्रिया और फीडबैक देने के लिए 30 दिनों का समय दिया गया है।

तकनीकी बदलाव और टेस्टिंग के नए नियम

वर्तमान में देश में BS VI मानक लागू हैं, जो साल 2020 से प्रभावी हुए थे। प्रस्तावित BS VII नियम केवल टेलपाइप उत्सर्जन तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इसमें व्यापक रियल वर्ल्ड ड्राइविंग टेस्ट भी शामिल किए जाएंगे।

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नियमों के विस्तार के तहत अब कुछ नए क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, जिनमें शामिल हैं:

  • ब्रेक पार्टिकल उत्सर्जन की निगरानी।
  • टायर घिसावट (abrasion) से होने वाला प्रदूषण।
  • हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बैटरी की टिकाऊपन।

बैटरी टिकाऊपन के नियम के अनुसार, निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि पांच साल के उपयोग या 1,00,000 किलोमीटर चलने के बाद भी बैटरी अपनी मूल क्षमता का 75 प्रतिशत बनाए रखे।

ड्राफ्ट प्रस्ताव में पार्टिकल नंबर लिमिट को घटाकर 10nm कर दिया गया है। हालांकि कुछ प्रदूषकों के लिए मुख्य टेलपाइप सीमाएं BS VI के समान ही रहेंगी, लेकिन अब वाहन के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए ऑनबोर्ड मॉनिटरिंग सिस्टम जोड़ा जाएगा। इन उपायों का उद्देश्य भारतीय शहरों में हवा की गुणवत्ता में सुधार करना है।

ऑटोमोबाइल उद्योग पर प्रभाव और चुनौतियां

इन अपडेटेड नियमों के कारण ऑटोमोबाइल निर्माताओं के सामने बड़ी चुनौतियां आ सकती हैं। इंडस्ट्री अधिकारियों का कहना है कि टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने की जरूरत से इलेक्ट्रिक वाहन विकास कार्यक्रमों के महत्वपूर्ण संसाधन प्रभावित हो सकते हैं।

एक बड़ा जोखिम यह है कि इन नियमों को पूरा करने की लागत के कारण उपभोक्ताओं के लिए गाड़ियों की रिटेल कीमतें बढ़ सकती हैं। हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि बदलाव की यह अवधि इतनी लंबी है कि उद्योग इसके लिए पर्याप्त तैयारी कर लेगा।

कुछ ऑटोमोबाइल कंपनियों को इन कड़े मानकों को जल्दी अपनाने से प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है। भारतीय वाहनों की निर्यात क्षमता को बढ़ाने के लिए वैश्विक मानकों के साथ यह तालमेल जरूरी माना जा रहा है।

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जन स्वास्थ्य समर्थकों ने नॉन-एग्जॉस्ट उत्सर्जन की निगरानी के इस कदम का पुरजोर समर्थन किया है। सरकारी अधिकारी फिलहाल पर्यावरण समूहों और ऑटोमोबाइल टेस्टिंग एजेंसियों से मिलने वाले फीडबैक के आधार पर ड्राफ्ट में संभावित संशोधनों की समीक्षा कर रहे हैं। भविष्य के अपडेट परामर्श अवधि समाप्त होने के बाद जारी होने वाली अंतिम अधिसूचना पर निर्भर करेंगे।

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