Skip to main content

Naradsamvad

[post-views]

भारत में जानवरों पर होने वाले रिसर्च के नियमों में बदलाव की तैयारी, मंजूरी प्रक्रिया होगी आसान

Fisheries, Animal Husbandry and Dairying मंत्रालय ने भारत में दवाओं के शोध के लिए दी जाने वाली मंजूरी की प्रक्रिया को तेज करने के लिए जानवरों पर किए जाने वाले प्रयोगों के नियमों में बड़े बदलाव का प्रस्ताव रखा है। इस नए प्रस्ताव के तहत निर्णय लेने की अधिक शक्ति अब संस्थागत नैतिकता समितियों (institutional ethics committees) को दी जाएगी।

Ad image

इन नए नियमों में शोध कार्यों को जानवरों को होने वाले दर्द के स्तर के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। हालांकि, इस बदलाव के बाद अब इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या इससे निगरानी व्यवस्था कमजोर हो जाएगी।

वर्तमान में भारत में शोध के तौर-तरीकों को मुख्य रूप से Experiments on Animals (Control and Supervision) Rules, 1968 और Breeding of and Experiments on Animals (Control and Supervision) Rules, 1998 के जरिए नियंत्रित किया जाता है। मौजूदा ढांचे के तहत, Central Control and Supervision of Experiments on Animals (CCSEA) कुत्तों, बकरियों, सूअरों, मवेशियों और बंदरों जैसे बड़े जानवरों के प्रयोगों की मंजूरी देता है।

वहीं छोटे जानवरों जैसे चूहों और पक्षियों के प्रयोगों की देखरेख Institutional Animal Ethics Committees (IAECs) द्वारा की जाती है। अब Prevention of Cruelty to Animals (Control and Supervision of Experiment, Breeding and Trading of Laboratory Animals) Rules, 2026 के ड्राफ्ट के जरिए इन पुराने नियमों को एक नए रिस्क-आधारित सिस्टम में शामिल करने की कोशिश की गई है। Economic Times के अनुसार, इस प्रस्ताव में आधिकारिक तौर पर 3Rs सिद्धांतों यानी रिप्लेसमेंट, रिडक्शन और रिफाइनमेंट को शामिल किया गया है।

ALSO READ  कानपुर के दो दोस्तों की चन्दौली में मिली लाश, वाराणसी यात्रा के दौरान हुई संदिग्ध मौत

मंजूरी की प्रक्रिया और नए नियमों के प्रावधान

नए नियमों के तहत, जानवरों पर किए जाने वाले प्रयोगों को चार अलग-अलग स्तरों में बांटा जाएगा: माइल्ड (mild), मॉडरेट (moderate), सीवियर (severe) और नॉन-रिकवरी (non-recovery)। अब रजिस्टर्ड IAECs को माइल्ड और मॉडरेट प्रयोगों को मंजूरी देने का अधिकार मिलेगा, चाहे उनमें बड़े जानवर ही क्यों न शामिल हों।

हालांकि, अगर प्रयोग सीवियर या नॉन-रिकवरी श्रेणी के हैं और उनमें कृंतक (rodent) और लेगोमोर्फ (lagomorph) से बड़े जानवरों का इस्तेमाल हो रहा है, तो उन्हें अभी भी CCSEA से मंजूरी लेनी होगी। इसके लिए पहले IAEC की सिफारिश जरूरी होगी।

प्रयोगशालाओं और शोध संस्थानों को अपना रजिस्ट्रेशन बनाए रखने के लिए इन नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। यह रजिस्ट्रेशन आमतौर पर तीन साल के लिए वैध रहता है। हर IAEC में कुल नौ सदस्य होने चाहिए, जिनमें वैज्ञानिक, पशु चिकित्सक और बाहरी प्रतिनिधि शामिल होंगे। इनका काम यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रयोगशाला के जानवरों के रहने और देखभाल के मानक तय नियमों के मुताबिक हों।

ALSO READ  चंदौली में पुलिस लाइन निर्माण के दौरान सातवीं मंजिल से गिरा मजदूर, मौत के बाद भारी विरोध

हाई-कंटेनमेंट प्रयोगशालाओं के लिए सालाना ऑडिट और समय-समय पर निरीक्षण अनिवार्य किया गया है। इसके अलावा, ड्राफ्ट नियमों में जंगली, आवारा और बेसहारा जानवरों के उपयोग पर पाबंदी लगाई गई है। इनका उपयोग केवल बहुत विशिष्ट वैज्ञानिक कारणों से और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति मिलने पर ही किया जा सकेगा। इन मानकों का उल्लंघन करने पर किसी भी संस्थान का रजिस्ट्रेशन तुरंत निलंबित या रद्द किया जा सकता है।

उद्योग जगत की खुशी और पशु कल्याण समूहों का विरोध

दवा बनाने वाली कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों को इन बदलावों से काफी फायदा होने की उम्मीद है। इससे नियमित शोध के लिए मंजूरी मिलने का समय कम हो जाएगा। माना जा रहा है कि इस दक्षता से बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत के नवाचार लक्ष्यों को मदद मिलेगी। Hindustan Times की रिपोर्ट बताती है कि इस कदम से भारतीय दवा विकास वैश्विक प्रतिस्पर्धी मानकों के करीब पहुंच सकता है।

दूसरी ओर, पशु कल्याण कार्यकर्ताओं ने इस ड्राफ्ट का कड़ा विरोध किया है। People for Animals की ट्रस्टी गौरी मौलेखी ने इस प्रस्ताव को विनाशकारी बताया है। उनका कहना है कि इससे संस्थानों को अपने शोध का वर्गीकरण खुद करने और कई मामलों में CCSEA को नजरअंदाज करने की छूट मिल जाएगी।

ALSO READ  इज़राइल के स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी और पायलट स्मित मच्छड़ को मशाल जलाने का निमंत्रण

Humane World for Animals India ने भी चेतावनी दी है कि जानवरों के स्रोत में भिन्नता और केंद्रीय सुरक्षा उपायों के कमजोर होने से वैज्ञानिक विश्वसनीयता कम हो सकती है।

जनता की राय और अंतिम समय सीमा

मंत्रालय ने इस ड्राफ्ट को 30 सितंबर 2026 के आसपास आधिकारिक गजट में प्रकाशित किया था, जिसका संदर्भ G.S.R. 864(E) है। फिलहाल इस पर जनता से फीडबैक लिया जा रहा है। सुझाव या आपत्तियां नवंबर 2026 की शुरुआत तक जमा करनी होंगी, जिसमें कुछ स्रोतों ने 6 नवंबर को अंतिम समय सीमा बताया है।

परामर्श की अवधि समाप्त होने के बाद, सरकार फीडबैक की समीक्षा करेगी और फिर नियमों को अंतिम रूप देगी। इसके लागू होने के बाद वर्गीकरण और रिपोर्टिंग के लिए नए मार्गदर्शन दस्तावेज तैयार किए जाएंगे। जहां एक तरफ उद्योग जगत इन बदलावों की तैयारी कर रहा है, वहीं कल्याण समूह प्रयोगशाला परीक्षणों में नैतिक मानकों को बचाने के लिए सख्त नियंत्रण की मांग कर रहे हैं।

अन्य खबरे

गोल्ड एंड सिल्वर

Our Visitors

Home
Account
Cart
Search
error: Content is protected !!