चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा साल 2026 के पहले नौ महीनों के दौरान 105.93 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा चीन के General Administration of Customs द्वारा 14 अक्टूबर 2026 को जारी किया गया है। यह डेटा दिखाता है कि भारत के निर्यात में बढ़ोतरी के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार में बड़ा असंतुलन बना हुआ है।
इन नौ महीनों के दौरान दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 144.45 अरब डॉलर रहा। पिछले साल की तुलना में इसमें 25.4 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर्ज की गई है। इस अवधि में चीन से भारत आने वाले निर्यात में 23.3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है, जो कुल 125.19 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
वहीं दूसरी ओर, भारत द्वारा चीन को किए गए निर्यात में 40.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 19.26 अरब डॉलर रहा। हालांकि, भारत का निर्यात अभी भी आयात की तुलना में बहुत कम है, जिसके कारण घाटा बढ़ रहा है। The Hindu BusinessLine, The Economic Times, Financial Express और PTI जैसे माध्यमों ने कस्टम्स रिपोर्ट के इन आंकड़ों की पुष्टि की है।
व्यापार घाटे की स्थिति और आर्थिक निर्भरता
पिछले साल के मुकाबले इस व्यापार घाटे में 20.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जिस रफ्तार से यह घाटा बढ़ रहा है, उससे संकेत मिलते हैं कि कुल वार्षिक अंतर पिछले सभी ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ सकता है। भारतीय वाणिज्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए व्यापार 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया था।
उस समय सीमा के दौरान, भारत ने चीन को 19.47 अरब डॉलर का निर्यात किया था, जबकि आयात 131.63 अरब डॉलर का था। इसके परिणामस्वरूप वार्षिक घाटा लगभग 112.16 अरब डॉलर रहा। यह पिछले वर्ष दर्ज किए गए 99.2 अरब डॉलर के घाटे से काफी ज्यादा है।
भारतीय निर्माता अपनी जरूरतों के लिए चीन पर काफी निर्भर हैं। भारत मुख्य रूप से चीन से निम्नलिखित चीजें मंगवाता है:
- केमिकल्स (रसायन)
- मशीनरी
- इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स
व्यापार के बदलते स्वरूप में प्रिंटेड सर्किट बोर्ड एक महत्वपूर्ण बदलाव है, जो अब आयात के बजाय भारत के एक प्रमुख निर्यात उत्पाद के रूप में उभर रहा है। इसके अलावा भारत से नैफ्था, समुद्री भोजन (सीफूड), अयस्क (ओर्स) और कृषि उत्पाद चीन भेजे जाते हैं।
उच्च स्तरीय बैठकें और भविष्य की रणनीति
व्यापार के इस असंतुलन को दूर करने के लिए हाल ही में उच्च स्तरीय चर्चाएं हुई हैं। आधिकारिक रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले महीने आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi और चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping ने बातचीत की। उन्होंने मार्केट एक्सेस, सप्लाई चेन की चिंताओं और व्यापारिक ढांचे से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा की।
व्यापार विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय निर्यात में प्रतिशत की बढ़ोत्तरी उत्साहजनक है, लेकिन यह चीन से होने वाले भारी आयात की भरपाई करने के लिए काफी नहीं है। सरकार की प्राथमिकता भारतीय सेवाओं और उच्च मूल्य वाले सामानों के लिए बाजार तक पहुंच बनाना है, हालांकि इस दिशा में प्रगति धीमी है।
विशेषज्ञों का तर्क है कि इस अंतर को पाटने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में घरेलू क्षमता बढ़ानी होगी। इस घाटे का असर मुद्रा की स्थिति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर भी पड़ता है। चीन का निर्यात इंजन अभी भी मजबूत है और केवल सितंबर महीने में ही उसके वैश्विक निर्यात में 36.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
भारत ने इस स्थिति से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें शामिल हैं:
- एंटी-डंपिंग उपाय
- क्वालिटी कंट्रोल (गुणवत्ता नियंत्रण)
- घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI)
चीन के कस्टम अधिकारी साल 2027 की शुरुआत में पूरे वर्ष का डेटा जारी करेंगे। वहीं, भारतीय वाणिज्य मंत्रालय वित्त वर्ष के आंकड़ों के जरिए एक समानांतर विवरण देना जारी रखेगा। आने वाले समय में द्विपक्षीय और BRICS वार्ताओं में इन व्यापारिक मुद्दों पर फिर से चर्चा होने की उम्मीद है। यह देखा जाएगा कि मौजूदा प्रोत्साहन योजनाओं और टैरिफ बदलावों से आने वाले महीनों में व्यापार की यह दिशा बदलती है या नहीं।

























