इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2026 को एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य चुनाव आयोग को आदेश दिया है कि वे पूरे राज्य में पंचायत चुनाव तीन महीने की अवधि के भीतर पूरे कर लें।
यह फैसला जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की एक डिवीजन बेंच ने सुनाया। यह आदेश तीन घंटे तक चली सुनवाई के बाद आया, जिसमें कुल 11 याचिकाओं को एक साथ जोड़कर सुना गया था। इन याचिकाओं में छह जनहित याचिकाएं (PIL) भी शामिल थीं, जिनमें चुनावों में देरी और प्रशासकों की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी।
प्रशासकों की नियुक्ति और आरक्षण के नियम
अदालत ने राज्य सरकार के 25 मई 2026 के उस आदेश की वैधता को बरकरार रखा है, जिसके तहत कार्यकाल खत्म होने के बाद निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया था। ये प्रशासक नए चुनाव होने तक तीन महीने की समय सीमा के दौरान अपने पदों पर बने रहेंगे।
आरक्षण के मुद्दे पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया मौजूदा ढांचे के तहत ही आगे बढ़ेगी। इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27% आरक्षण शामिल है। कोर्ट ने यह भी कहा कि OBC कमीशन द्वारा किया जा रहा काम चुनाव की समय सीमा में बाधा नहीं बनना चाहिए।
विपक्षी दल की प्रतिक्रिया और आरोप
यूपी कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती आराधना मिश्रा मोना ने अदालत के इस फैसले का औपचारिक रूप से स्वागत किया है। उन्होंने इस कदम को लोकतांत्रिक शासन को बहाल करने के लिए एक जरूरी कदम बताया। उन्होंने राज्य प्रशासन से सवाल किया कि समय पर चुनाव कराने में उन्हें किस बात का डर था और सरकार आखिर क्यों हिचकिचा रही थी।
मोना ने तर्क दिया कि अगर समय पर नियमित चुनाव होते, तो स्थानीय विकास बेहतर तरीके से हो पाता। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार ने जानबूझकर इस प्रक्रिया में देरी की। उनके अनुसार, सरकार को डर था कि ग्रामीण मुद्दे जैसे बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले उसकी छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
सरकार के पास अब दो विकल्प
अदालत के इस आदेश के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार के सामने दो रास्ते बचे हैं। सरकार या तो तय किए गए तीन महीनों के भीतर पंचायत चुनाव आयोजित करने का फैसला कर सकती है।
दूसरा विकल्प यह है कि सरकार इस न्यायिक आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती है।

























