भारत के सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक बड़ा निर्देश दिया है। कोर्ट ने साल 2023 से मऊ जिले में तैनात रहे सभी पुलिस अधीक्षकों (SPs) के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया है।
यह आदेश 21 सितंबर 2026 को जस्टिस अहसनुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने जारी किया। यह कदम 2017 के एक अपहरण मामले में अभियोजन पक्ष द्वारा दिखाई गई भारी लापरवाही और गंभीरता की कमी के बाद उठाया गया है।
पूरा मामला 14 साल के सचिन मौर्य के अपहरण से जुड़ा है, जो 27 सितंबर 2017 को लापता हो गया था। नौ साल बीत जाने के बाद भी बच्चे का कोई पता नहीं चला है और न ही उसका कोई अवशेष बरामद हो पाया है।
अदालत ने ट्रायल में देरी पर जताई नाराजगी
इस मामले में 27 मार्च 2023 को छह आरोपियों के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय किए गए थे। इसके बावजूद ट्रायल की रफ्तार बेहद धीमी रही है। अब तक कुल 54 गवाहों में से केवल दो गवाहों के बयान दर्ज किए गए हैं।
कोर्ट ने इस देरी पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला केवल कागजी कार्रवाई का नहीं बल्कि एक इंसान की जिंदगी से जुड़ा है। कोर्ट ने साफ किया कि गवाहों को पेश करना जांच एजेंसी की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
मऊ पुलिस प्रशासन में हुए बदलाव
मामले की सुनवाई के दौरान 10 अगस्त 2026 को मऊ के तत्कालीन एसपी कमलेश बहादुर कोर्ट में पेश हुए थे। इसके बाद उन्होंने 29 अगस्त 2026 को एक हलफनामा भी दाखिल किया था।
इन कानूनी कार्यवाहियों के बाद 7 अक्टूबर 2026 को कमलेश बहादुर का तबादला कर दिया गया। उन्हें पुलिस मुख्यालय में एसपी, जन शिकायत की जिम्मेदारी सौंपी गई। अब सर्वेश कुमार मिश्रा को मऊ का नया एसपी नियुक्त किया गया है।
समय सीमा और अनुशासनात्मक कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि पूर्व एसपी के खिलाफ विभागीय जांच 21 सितंबर के आदेश के दो हफ्ते के भीतर शुरू कर दी जानी चाहिए। कोर्ट ने इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए समय सीमा तय की है।
इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को 16 नवंबर 2026 तक कोर्ट में एक व्यक्तिगत रूप से सत्यापित हलफनामा जमा करना होगा। इस रिपोर्ट में निम्नलिखित विवरण होने चाहिए:
- पूर्व एसपी के खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई का पूरा ब्यौरा।
- अनुशासनात्मक कार्यवाही में अब तक कितनी प्रगति हुई है।
- सरकार द्वारा उठाए गए अन्य जरूरी कदम।































