भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की एक नई पीयर-रिव्यूड स्टडी में यह पाया गया है कि उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी भारत के बड़े हिस्से अब अधिक गर्म और सूखे जलवायु क्षेत्रों में बदल गए हैं। यह खोज बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि किसान और योजना बनाने वाले लोग जलवायु मानदंडों में एक दीर्घकालिक बदलाव का सामना कर रहे हैं।
इस बदलाव के कारण वर्तमान कृषि रणनीतियां अब उतनी प्रभावी नहीं रह गई हैं। यह शोध ‘मौसम’ जर्नल के अक्टूबर 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है, जिसमें 1951 से 2020 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।
IMD पुणे की वैज्ञानिक अनन्या करमकर, IITM के राजिब चट्टोपाध्याय और IMD के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा ने कोपेन-गीगर वर्गीकरण प्रणाली का उपयोग करके इन बदलावों का नक्शा तैयार किया है।
उत्तर-पश्चिम भारत में सूखे क्षेत्रों का विस्तार
इस अध्ययन में विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम में गर्म अर्ध-शुष्क क्षेत्र के उल्लेखनीय विस्तार की ओर इशारा किया गया है। 1951 से 1980 के बीच यह क्षेत्र इस इलाके के लगभग एक चौथाई हिस्से में था, जो 1991 से 2020 की अवधि के दौरान बढ़कर लगभग एक तिहाई हो गया है।
इसी समय के दौरान, समशीतोष्ण क्षेत्र (temperate zone) लगभग एक चौथाई से घटकर क्षेत्र के पांचवें हिस्से से भी कम रह गया है। पेपर के अनुसार, इसका मतलब है कि व्यापक क्षेत्र का लगभग 7 प्रतिशत हिस्सा सूखे हालातों की ओर बढ़ गया है।
क्षेत्रीय जलवायु परिवर्तन और खेती पर असर
शोधकर्ताओं ने देखा कि सूखा क्षेत्र जो पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाप्त होता था, अब वह और पूर्व की ओर बढ़ गया है। महाराष्ट्र में मराठवाड़ा और पश्चिम विदर्भ के जिले ट्रॉपिकल सवाना जलवायु से बदलकर गर्म अर्ध-शुष्क श्रेणी में आ गए हैं।
अनन्या करमकर के बयानों के अनुसार, दिन और रात के तापमान में वृद्धि इस बदलाव का मुख्य कारण है। इससे यह संकेत मिलता है कि हाल के सूखे स्थायी जलवायु परिवर्तन की पृष्ठभूमि में हो रहे हैं।
तटीय क्षेत्रों में अलग तरह का रुझान देखा गया है। गोवा, कोंकण तट, तटीय कर्नाटक और केरल में ट्रॉपिकल मानसून क्षेत्र का विस्तार हुआ है। इसके विपरीत, उत्तर-पूर्व और गंगा बंगाल के कुछ हिस्सों में ट्रॉपिकल सवाना श्रेणी में गिरावट आई है और समशीतोष्ण स्थितियों का विस्तार हुआ है।
कृषि योजनाओं में बदलाव की जरूरत
मृत्युंजय महापात्रा ने बताया कि देश के रिकॉर्ड दिखाते हैं कि इन क्षेत्रों की जलवायु ट्रॉपिकल जोन से बाहर जा रही है। इस वजह से अब कृषि परामर्श (agricultural advisories) में संशोधन करना जरूरी हो गया है।
अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि बुवाई और कटाई के कैलेंडर सहित वर्तमान कृषि योजना का नए वास्तविक हालातों के अनुसार तत्काल पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के आंतरिक इलाकों के किसानों को अधिक गर्मी और नमी के तनाव से विशेष जोखिम है।
ये क्षेत्र खाद्यान्न और नकदी फसलों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र हैं। लेखकों ने चेतावनी दी है कि राष्ट्रीय स्तर पर यह 7 प्रतिशत का बदलाव उत्तरी भारत कृषि-जलवायु क्षेत्र को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।
भविष्य की चुनौतियां और सरकारी कदम
भविष्य के शोध में अभी कई महत्वपूर्ण कमियों को दूर करना बाकी है। वैज्ञानिकों को इन नए बने अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए विशिष्ट सिंचाई सीमाओं (irrigation thresholds) को निर्धारित करने की आवश्यकता है।
यह अभी स्पष्ट नहीं है कि 2020 के बाद ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन इन दर्ज बदलावों के साथ कैसे तालमेल बिठाएगा। अन्य सवाल भूजल पुनर्भरण पर सटीक मात्रात्मक प्रभाव और भारतीय उपविभागों पर विक्टोरिया मोड जैसे महासागरीय पैटर्न के दीर्घकालिक प्रभाव से संबंधित हैं।
सरकारी विभागों को इस दीर्घकालिक आधार रेखा को अपने पूर्वानुमान मॉडलों में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की राज्य सरकारें वर्तमान में सक्रिय सूखा स्थितियों को संभाल रही हैं, लेकिन यह वैज्ञानिक डेटा दीर्घकालिक अनुकूलन का आधार प्रदान करता है।
अधिकारियों और कृषि योजनाकारों को सलाह दी गई है कि वे इन विकसित होते जलवायु जोखिमों को कम करने के लिए सूखा-सहिष्णु फसल किस्मों को बढ़ावा देने और अधिक कुशल जल प्रबंधन प्रथाओं को प्राथमिकता दें।































