भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए विमानन क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव करने का निर्णय लिया है। जनवरी 2027 से एयरलाइंस को अपने पारंपरिक जेट ईंधन में 1 प्रतिशत सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल यानी टिकाऊ विमानन ईंधन का मिश्रण शामिल करना होगा।
यह कदम दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के वैश्विक प्रयासों के साथ तालमेल बिठाने के लिए उठाया गया है। इस फैसले से घरेलू विमानन क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव आएगा।
सरकार ने इस मिश्रण की मात्रा को समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ाने की योजना बनाई है। 21 अक्टूबर 2026 को आई रिपोर्ट्स के अनुसार, मिश्रण की यह अनिवार्यता 2028 तक बढ़कर 2 प्रतिशत और 2030 तक 5 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी।
अंतरराष्ट्रीय मानकों और CORSIA के साथ तालमेल
भारत का यह नया शेड्यूल इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन द्वारा तय किए गए नियमों के समान है। यह खासतौर पर इंटरनेशनल एविएशन के लिए कार्बन ऑफसेटिंग एंड रिडक्शन स्कीम, जिसे CORSIA कहा जाता है, के अनुरूप है।
CORSIA का अनिवार्य चरण 1 जनवरी 2027 से शुरू होने जा रहा है। इस योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस के लिए यह जरूरी है कि वे अपने उन उत्सर्जन की भरपाई करें जो उनके 2019 के स्तर के 85 प्रतिशत से अधिक हैं।
इंडस्ट्री सोर्स के अनुसार, एयरलाइंस इस लक्ष्य को दो तरीकों से पूरा कर सकती हैं:
- मंजूर किए गए सस्टेनेबल फ्यूल का इस्तेमाल करके।
- कार्बन क्रेडिट खरीदकर।
विमानन क्षेत्र और रिफाइनरियों पर प्रभाव
इन नए नियमों को लागू करने के लिए घरेलू स्तर पर तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस पूरी प्रक्रिया में Ministry of Civil Aviation, Directorate General of Civil Aviation और Indian Oil जैसी सरकारी कंपनियां मुख्य भूमिका निभा रही हैं।
शुरुआती 1 प्रतिशत ईंधन की जरूरत को पूरा करने के लिए Panipat Refinery में क्षमता विस्तार का काम पहले से ही चल रहा है। हालांकि, इन मानकों के कारण एयरलाइंस पर बड़ा वित्तीय बोझ पड़ेगा।
Air India जैसी कंपनियों को इस बदलाव से काफी खर्च उठाना पड़ सकता है। अनुमान है कि एयरलाइंस को सालाना 50 मिलियन से 75 मिलियन डॉलर तक का ऑफसेटिंग खर्च वहन करना पड़ सकता है। यह अभी तय नहीं है कि कंपनियां यह खर्च खुद उठाएंगी या टिकट की कीमतें बढ़ाकर यात्रियों पर डालेंगी।
उत्पादन की चुनौतियां और भविष्य की योजनाएं
देश में इस ईंधन के सीमित स्थानीय उत्पादन के कारण विमानन क्षेत्र के सामने बड़ी चुनौती है। हालांकि यह कदम जलवायु प्रतिबद्धताओं और वैश्विक स्थिरता लक्ष्यों का समर्थन करता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लिए एक विस्तृत नीति की जरूरत है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस ढांचे में ईंधन की कीमतों, उत्पादन बढ़ाने के तरीकों और कार्बन क्रेडिट मार्केट को शामिल करना होगा ताकि इसे लंबे समय तक टिकाऊ बनाया जा सके।
इस बदलाव से जुड़ी कई जानकारियां अभी विकसित की जा रही हैं। अधिकारियों ने अभी तक अनुपालन तंत्र और लक्ष्य पूरा न करने वाली एयरलाइंस के लिए जुर्माने की प्रक्रिया तय नहीं की है। सरकार ने अभी तक इस संक्रमण काल के लिए पूरा नेशनल पॉलिसी फ्रेमवर्क भी जारी नहीं किया है।
रिफाइनरियां अब 2027 की समय सीमा को पूरा करने के लिए अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में जुटी हैं। एयरलाइंस को अब अपने फ्यूल अपलिफ्ट रणनीतियों में बदलाव करना होगा ताकि वे अनिवार्य मिश्रण की शर्तों को पूरा कर सकें। जल्द ही सरकार की ओर से इन चरणों की पुष्टि करने वाला आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी होने की उम्मीद है।































