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हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने खोजा DZIP3 प्रोटीन, जो वायरस के खिलाफ शरीर में बजाता है खतरे की घंटी

हैदराबाद स्थित CSIR सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के वैज्ञानिकों ने DZIP3 प्रोटीन की पहचान की है। यह प्रोटीन शरीर के भीतर एक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम यानी शुरुआती चेतावनी प्रणाली की तरह काम करता है। जब यह प्रोटीन वायरस के जेनेटिक मटेरियल को पहचान लेता है, तब यह शरीर की जन्मजात प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इननेट इम्यून डिफेंस को सक्रिय कर देता है।

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इस महत्वपूर्ण खोज से भविष्य में व्यापक प्रभाव वाली एंटीवायरल थेरेपी विकसित करने का रास्ता खुल सकता है। इस पूरी रिसर्च की विस्तृत जानकारी इस हफ्ते पियर रिव्यूड जर्नल ‘The EMBO Journal’ में प्रकाशित एक अध्ययन में दी गई है।

जब कोई वायरस मानव कोशिका के अंदर घुसता है, तो उसे तुरंत पहचानना बहुत जरूरी होता है ताकि वह अपनी संख्या न बढ़ा सके। आम तौर पर कोशिकाएं बाहरी जेनेटिक मटेरियल का पता लगाने के लिए खास सेंसर का इस्तेमाल करती हैं। इसके बाद वे टाइप I इंटरफेरॉन रिलीज करती हैं, जो ऐसे अणु होते हैं जो वायरस को फैलने से रोकते हैं।

DZIP3 प्रोटीन के काम करने का तरीका

CSIR-CCMB के सीनियर प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ संतोष चौहान ने इस रिसर्च का नेतृत्व किया। उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने लगभग सात साल पहले यह अनुमान लगाया था कि कुछ खास मानव प्रोटीन वायरस के RNA को पहचान सकते हैं और साथ ही इम्यून सिस्टम को अलर्ट भी कर सकते हैं। यह नया अध्ययन अब इस बात की पुष्टि करता है कि DZIP3 प्रोटीन वास्तव में इन दोनों कामों को एक साथ करता है।

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इस शोध टीम में फर्स्ट ऑथर डॉ रिंकू साहू के साथ कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोगी शामिल थे। इस पूरी टीम ने कई सालों तक डेटा का विश्लेषण किया। इस पूरे शोध कार्य को डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी की ओर से फंडिंग दी गई थी।

कोशिका के अंदर DZIP3 प्रोटीन तब तक निष्क्रिय रहता है जब तक कि इसका सामना वायरल RNA से नहीं होता। जैसे ही यह RNA से मिलता है, प्रोटीन की बनावट में बदलाव आता है और यह सक्रिय हो जाता है। इसके बाद यह प्रोटीन माइटोकॉन्ड्रिया की ओर चला जाता है।

माइटोकॉन्ड्रिया पहुंचने के बाद यह RIG I और MAVS नाम के दो महत्वपूर्ण प्रोटीनों के साथ जुड़ जाता है। ये दोनों प्रोटीन इम्यून सिग्नलिंग के लिए बहुत जरूरी होते हैं। DZIP3 प्रोटीन RIG I के K63 लिंक्ड उबिक्विटिनेशन को बढ़ावा देकर पूरे कॉम्प्लेक्स को स्थिर करता है, जिससे टाइप I इंटरफेरॉन का भारी मात्रा में उत्पादन होता है।

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इन वायरस के खिलाफ मिली सफलता

प्रयोगशाला में किए गए टेस्ट से यह साबित हो चुका है कि यह तरीका कई RNA वायरस को रोकने में सफल रहा है। इस मैकेनिज्म द्वारा रोके गए वायरस की सूची में निम्नलिखित रोगजनक शामिल हैं:

  • SARS-CoV-2, जिससे COVID-19 होता है
  • चिकुनगुनिया वायरस
  • जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस
  • इन्फ्लुएंजा A वायरस

शोधकर्ताओं ने देखा कि जब कोशिका में DZIP3 की कमी हो गई, तो वायरस से लड़ने की कोशिका की क्षमता काफी घट गई। इसके विपरीत, जब यह प्रोटीन मौजूद था, तो टेस्ट किए गए मॉडल्स में वायरस की संख्या बढ़ने पर प्रभावी ढंग से रोक लगाई गई।

इस रिसर्च पेपर के 21 और 22 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित होने के बाद द हिंदू, तेलंगाना टुडे और ANI जैसे कई मीडिया संस्थानों ने इसकी रिपोर्ट दी। डॉ चौहान ने जोर देकर कहा कि DZIP3 कैसे वायरल RNA को पहचानता है और इम्यून मशीनरी को चालू करता है, इसे समझने से मानव प्रतिरक्षा प्रणाली की गहरी समझ मिलती है।

उन्होंने आगे कहा कि छोटे अणुओं (small molecules) के जरिए इस प्रोटीन को टारगेट करके व्यापक एंटीवायरल थेरेपी बनाई जा सकती है। इस तरीके से डॉक्टर केवल वायरस-विशिष्ट वैक्सीन या दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय शरीर की प्राकृतिक इम्युनिटी को मजबूत कर सकेंगे।

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दवाओं के विकास की भविष्य की राह

रिसर्च टीम अब ऐसे छोटे अणु वाले ड्रग कैंडिडेट्स विकसित करने पर ध्यान दे रही है जो DZIP3 की गतिविधि को बढ़ा सकें। हालांकि अभी तक के सभी सबूत प्रयोगशाला की कोशिकाओं और मॉडल सिस्टम पर आधारित हैं। टीम अब इस काम को आगे बढ़ाकर संभावित कंपाउंड्स का परीक्षण करना चाहती है।

इस खोज से लेकर एक मान्यता प्राप्त क्लिनिकल थेरेपी तक पहुंचने का रास्ता काफी लंबा है। इसमें प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल ट्रायल की एक लंबी प्रक्रिया शामिल होती है, क्योंकि इस स्तर पर इंसानों में इसकी प्रभावकारिता अभी साबित नहीं हुई है।

वैज्ञानिक समुदाय अब इस खोज से जुड़े कई सवालों पर विचार कर रहा है। भविष्य के अध्ययनों में यह देखना होगा कि इंसानों में वास्तविक शारीरिक स्थितियों के तहत DZIP3 का सक्रियण कितना प्रभावी है। साथ ही यह भी जांचना होगा कि क्या छोटे अणु बढ़ाने वाले तत्व सुरक्षित और चयनात्मक हो सकते हैं।

शोधकर्ता अब इस बात की भी जांच कर सकते हैं कि क्या यह रास्ता गैर-वायरल सूजन वाली स्थितियों में कोई भूमिका निभाता है या क्या यह अन्य उभरते वायरल खतरों के लिए एक लक्ष्य बन सकता है।

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