भारत और यूरोपीय संघ ने यूरोपीय संघ के प्रमुख रिसर्च और इनोवेशन प्रोग्राम Horizon Europe के साथ भारत के औपचारिक जुड़ाव को लेकर बातचीत सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। इस साझेदारी की मदद से भारतीय रिसर्च संस्थान जनवरी 2027 से प्रोग्राम के पिलर II के तहत सीधे फंड पा सकेंगे और सहयोगी प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व कर सकेंगे।
यूरोपीय आयोग ने 6 नवंबर 2026 को प्रेस रिलीज IP/26/2334 के जरिए इन वार्ताओं के समापन की आधिकारिक घोषणा की। इसके बाद 7 नवंबर 2026 को भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इस विकास की पुष्टि की। यह पहल 2001 में हस्ताक्षरित भारत-ईयू वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग समझौते पर आधारित है, जिसे 2030 तक के लिए नवीनीकृत किया गया है।
रिसर्च एक्सेस और सहयोग का विस्तार
यह जुड़ाव दोनों भागीदारों के बीच संस्थागत संबंधों में एक बड़ा बदलाव है। पहले यूरोपीय रिसर्च प्रोजेक्ट्स में शामिल भारतीय प्रतिभागियों को ज्यादातर अपने फंड खुद जुटाने पड़ते थे। अब समझौता साइन होने के बाद भारतीय संस्थाएं सीधे फंडिंग पाने और पिलर II के तहत प्रोजेक्ट्स को कोऑर्डिनेट करने के योग्य होंगी, जो ग्लोबल चुनौतियों और यूरोपीय औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता पर केंद्रित है।
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, सीधी पात्रता से यूरोपीय कॉल्स में भाग लेने वाले भारतीय शोधकर्ताओं के लिए समान अवसर मिलेंगे। हालांकि भारत प्रोग्राम में कितना वित्तीय योगदान देगा, इसका विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन सहयोगी देशों के लिए वित्तीय योगदान देना जरूरी होता है। इस प्रतिबद्धता की वास्तविक राशि सफल प्रोजेक्ट्स की संख्या और 2027 में समाप्त होने वाले वर्तमान Horizon Europe साइकिल की शेष अवधि पर निर्भर करेगी।
जलवायु, स्वास्थ्य, डिजिटल और औद्योगिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में रिसर्च और इनोवेशन के अवसर काफी बढ़ेंगे। प्रोजेक्ट फंडिंग के अलावा, इस जुड़ाव से टैलेंट मोबिलिटी बढ़ेगी और भारतीय शोधकर्ताओं को उन्नत यूरोपीय इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच मिलेगी। इंटरनल प्रोजेक्ट एनालिसिस के मुताबिक, इससे भारतीय संगठनों के नेतृत्व वाले रिसर्च कंसोर्टिया की संख्या में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
औपचारिक कार्यान्वयन के लिए शेष कदम
इस जुड़ाव के लिए हाल ही में कई राजनयिक कदम उठाए गए हैं। फरवरी 2026 में शुरुआती चर्चाएं शुरू हुई थीं, जिसके बाद 17 जुलाई 2026 को औपचारिक बातचीत शुरू की गई। वर्तमान रोडमैप दोनों पक्षों की आंतरिक प्रक्रियाओं को पूरा करने पर निर्भर है, जिसमें यूरोपीय संसद से सहमति प्राप्त करना शामिल है।
लक्ष्य जनवरी 2027 से जुड़ाव शुरू करने का है, लेकिन यह समयसीमा प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं के अधीन है। साइंस पॉलिसी विश्लेषकों का कहना है कि यह विकास वर्षों के जॉइंट को-फंडिंग मॉडल के बाद एक तार्किक प्रगति है। भविष्य की सफलता का मूल्यांकन 2027 की लॉन्च डेट के बाद भारतीय संस्थाओं द्वारा लीड या जॉइन किए गए प्रोजेक्ट्स की संख्या और गुणवत्ता के आधार पर किया जाएगा।
भारत और ईयू के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को इससे लाभ होगा क्योंकि यूरोपीय भागीदारों को भारतीय विशेषज्ञता और बाजारों तक गहरी पहुंच मिलेगी। इस व्यवस्था से सीधे तौर पर किसी भी संस्था को नुकसान होने की उम्मीद नहीं है, हालांकि गैर-सहयोगी तीसरे देशों को प्रोग्राम के तहत सीधी फंडिंग के अवसरों से बाहर रखा जाएगा। अब स्टेकहोल्डर्स आधिकारिक शुरुआत की ओर बढ़ते हुए भागीदारी दरों की निगरानी करेंगे।









