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Odisha Workers Struggle Story; Bandhua Majdur Tortured | Visakhapatnam | ब्लैकबोर्ड-काम का लालच देकर दलाल ने हमें बेच दिया: 10 साथी ट्रेन से कूदकर भाग गए, पकड़े गए तो हमारा हाथ काट दिया

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Naradsamvad - Narad news Agency
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‘दलाल ने रायपुर ले जाने के बहाने मेरे साथ 11 मजदूरों को ट्रेन में बैठाया, लेकिन जब हमें पता चला कि वह रायपुर के बजाय कहीं और लेकर जा रहा है, तो दूसरी बोगी में बैठे 10 मजदूर अगले स्टेशन पर कूदकर भाग गए। हम दो मजदूर दलाल के साथ अलग बोगी में थे, इसलिए फ

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‘वह हम दोनों को विशाखापट्टनम ले गया और एक छोटे से अंधेरे कमरे में बंद कर दिया। वहां वह बार-बार कहता कि मैं अपने दो लाख वसूलूंगा। वह एक रात शराब पीकर आया। हम दोनों को कमरे से बाहर निकाला और एक जंगल में घसीटते हुए लेकर गया। उसके हाथ में कुल्हाड़ी थी।’

‘वहां ले जाकर जोर-जोर से कहने लगा कि आज अपने 2 लाख वसूलूंगा। उसने मुझे जमीन पर लिटाया और दाएं हाथ पर कुल्हाड़ी से वार किया। मेरा हाथ कटकर अलग हो गया। मैं जमीन पर गिरकर लोटने लगा, फिर उसने इसी तरह हमारे साथी मजदूर के हाथ पर वार किया और उसका भी हाथ काट दिया। वह भी जमीन पर लोटने लगा। हमारा दर्द से बुरा हाल था। हम बस मौत का इंतजार कर रहे थे।’

यह बताते हुए ओडिशा के कालाहांडी जिले के पिपलहुंडा गांव के दयालु की आवाज कांपने लगती है।

ब्लैकबोर्ड में इस बार कहानी ओडिशा के बंधुआ मजदूरों की, जिनसे जबरदस्ती 16-17 घंटे काम करवाया जाता है और उन्हें टॉर्चर किया जाता है-

दयालु आगे बताते हैं, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि कोई इंसान किसी का हाथ इस तरह काट सकता है। सुबह होते ही वह दलाल हमें लेकर जंगल से निकला। एक ढाबे पर रुका, शायद वह हमें किसी गाड़ी से ले जाने का प्लान बना रहा था, लेकिन उस ढाबे के मालिक ने हमें देख लिया। वह मेरे पास आए और धीरे से पूछा- क्या हुआ बेटा? मैंने उन्हें सब बता दिया।’

‘उन्होंने चुपचाप पुलिस को फोन कर दिया। थोड़ी देर में पुलिस पहुंच गई और मिडिल मैन यानी दलाल को गिरफ्तार कर लिया। मुझे और मेरे साथी को अस्पताल पहुंचाया गया।’

‘डॉक्टरों ने वहां हमारा हाथ देखकर कहा, ‘इतना खून बहने पर भी बच जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है।’

‘महीनों अस्पताल में रहा। पुलिस की मदद से मां मुझे देखने पहुंचीं। वह मेरी हालत देखकर फूट-फूटकर रोने लगीं। सीने से लगाया, बाल सहलाए और कहा- अब कहीं नहीं जाने दूंगी।’

‘मैं सोच रहा था कि हाथ कट गया तो अब क्या ही फायदा जीने का, लेकिन मां की आंखों में खुद को देखा तो फिर से जीने की उम्मीद जगी।’

‘वहां से जब गांव पहुंचा तो मजदूरी करने की हालत में नहीं था। गांव वाले सहानुभूति जताते, लेकिन काम कोई नहीं देता। रिश्तेदार भी कहने लगे- अब इनसे कौन बेटी की शादी करेगा, इनके तो हाथ ही नहीं है।’

‘हाथ कटने से जितना दर्द हुआ था, अब उससे ज्यादा इन बातों से होने लगा।’

‘शादी की बात आते ही लोग मुंह फेर लेते हैं। मां चाहती थीं कि मेरी भी एक गृहस्थी हो, लेकिन जहां भी रिश्ता जाता है सिर्फ इनकार मिलता है।’

‘मैं अब मां के साथ रस्सी बनाने का काम करता हूं। हालांकि इस काम को भी करने में दिक्कत होती है, लेकिन मुश्किल से ही सही, कर लेता हूं। मां कहती हैं कि पैसे कम मिलते हैं तो क्या हुआ, तू मेरी आंखों के सामने तो है। अब मेरे लिए हर दिन एक नई परीक्षा है, लेकिन मां की खुशी से मुझे सुकून मिलता है।’

‘कभी-कभी सोचता हूं, काश पापा होते तो कुछ और होता। शायद जिंदगी को यूं ना खींचना पड़ता, लेकिन किस्मत को कोई नहीं टाल सकता।’

दयालु, जिनका आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में हाथ काट दिया गया था। उसके बाद इन्हें कोई काम नहीं मिला। अब मां के साथ रस्सी बनाने काम करते हैं।

दयालु, जिनका आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में हाथ काट दिया गया था। उसके बाद इन्हें कोई काम नहीं मिला। अब मां के साथ रस्सी बनाने काम करते हैं।

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दरअसल, दयालु की जिंदगी सामान्य नहीं रही। पिता की मौत के बाद घर की सारी जिम्मेदारी बहुत कम उम्र में उनके कंधों पर आ गई। मां, छोटी बहन और दो छोटे भाइयों के साथ वह जैसे-तैसे जिंदगी की गाड़ी खींच रहे थे।

वह बताते हैं, ‘मैं स्कूल जाने की उम्र में खेतों में मजदूरी करने लगा था। मां भी दूसरों के घरों में बर्तन मांजने जाती थीं, लेकिन दोनों मिलकर भी घर का खर्च नहीं चला पा रहे थे।’

‘पापा को एक दिन बुखार हुआ। तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई और अस्पताल ले गए तो वहां उन्होंने दम तोड़ दिया। मां ढांढस बंधाती थीं चिंता मत करो, मैं जिंदा हूं, लेकिन मैं जानता था कि अब सब कुछ बदल गया है। सारा बोझ मेरे ऊपर आ गया है।’

एक दिन गांव में कुछ लोग आए। कहा- रायपुर के पास एक ईंट-भट्ठे पर काम है, रोज 300 रुपए मजदूरी मिलेगी, रहने-खाने की भी व्यवस्था है। साथ में 10,000 रुपए एडवांस भी मिलेंगे।

दयालु को लगा- जैसे जिंदगी कोई मौका दे रही हो। मां से कहा- बस कुछ महीनों की बात है। जा रहा हूं, लौटूंगा तो पैसे भी होंगे और इज्जत भी, लेकिन दयालु के साथ फिर ये घटना घटी और अब उनका एक हाथ नहीं है।

यह कहानी सिर्फ दयालु की नहीं। ओडिशा के कालाहांडी, नुआपाड़ा, बोलांगीर, कोरापुट, मलकानगिरि और रायगढ़ा के गरीब परिवार अक्सर काम की तलाश में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और तमिलनाडु जाते हैं, जहां उनमें से कई के साथ इस तरह का अत्याचार होता है।

रायगढ़ा जिले के एक छोटे से गांव कुदुभटा की मानसी कुम्हार कहती हैं कि बाकी महिलाओं की तरह मेरी भी ख्वाहिशें थीं- अपने बच्चों को पढ़ाना, पति की बीमारी का इलाज कराना और घर को हंसी-खुशी चलाना, लेकिन जिंदगी सिर्फ चाहने से नहीं चलती। कभी-कभी यह वहां धकेल देती है, जहां सांस भी कर्ज बन जाती है।

‘दरअसल, हमारा परिवार कर्ज में डूबा था। घर में किसी के पास काम भी नहीं था। पति का लिवर खराब हो चुका था। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी, लेकिन इलाज के लिए पैसे नहीं थे।’

‘इस दौरान मेरे जीजा ने हमें बताया कि गांव में गंजम जिले से कुछ लोग आए हैं। वहां ईंट-भट्ठे पर काम दे रहे हैं। अच्छा पैसा देंगे, रहने के लिए घर, खाना और मजदूरी सब मिलेगी। लगा शायद अब रास्ता मिल गया है।’

‘हमने तय किया कि पूरा परिवार जाएगा। मेरे साथ पति, भाई, पापा सभी गए, लेकिन वहां हकीकत कुछ और थी। हमें घर देने की बात कही गई थी, पर वहां बस एक आधी-अधूरी दीवार थी, जिसके ऊपर पॉलिथीन बांधकर कामचलाऊ घर बनाए गए थे।’

‘बारिश होती तो उसमें पानी टपकता था और जमीन पर बिछा हमारा बिस्तर गीला हो जाता था। हम रातभर जागते रहते। हमें वहां पीने के लिए जो पानी मिलता था, वह भी गंदा होता था। नहाने के लिए तो पानी मिलता ही नहीं था।’

‘सुबह 3 बजे से ही हमें काम पर लगा दिया जाता था। मालिक इतना काम कराता कि खाने का भी वक्त नहीं देता था।’

‘वे हमें एक दिन में 1000 ईंट बनाने की बात कहकर ले गए थे, लेकिन वहां पहुंचते ही इसे बढ़ाकर 3000 ईंट कर दिया गया था। वे हर गलती पर गालियां देते और काम धीमा हो तो मारते थे।’

‘मैं गर्भवती थी। मैंने सोचा था कि शायद मुझे थोड़ा कम काम दिया जाएगा, लेकिन कोई रियायत नहीं दी गई। जिन लोगों का भट्ठा था, वे रात में दारू पीकर आते और हमें बेवजह मारते थे। एक बार मुझे भी मारा। धूप में घंटों खड़ा करके रखा था। चक्कर खाकर गिर गई। किसी ने मुझ पर पानी फेंका, फिर होश आया। मालिक ने उस दिन कहा था कि यहां काम करना है, आराम नहीं।’

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‘कई बार तो वे मुझे पीटने के बहाने गलत तरीके से छूते थे। प्राइवेट पार्ट पर हाथ रख देते थे। जब भी अकेले में बैठकर सोचती तो उन पर घिन आती थी। हमेशा सोचती कि अगली बार उन्हें छूने नहीं दूंगी, लेकिन मैं मजबूर थी। उनका सामना कैसे कर सकती थी। खून का घूंट पीकर रह जाती थी।’

ओडिशा के रायगढ़ा जिले एक छोटे से गांव कुदुभटा की मानसी कुम्हार। वह अपने हाल बताते हुए कहती हैं कि भट्टे पर हमारा शोषण होता था। कुछ लोग मुझे गलत तरीके से छूते और मेरा रेप करते थे।

ओडिशा के रायगढ़ा जिले एक छोटे से गांव कुदुभटा की मानसी कुम्हार। वह अपने हाल बताते हुए कहती हैं कि भट्टे पर हमारा शोषण होता था। कुछ लोग मुझे गलत तरीके से छूते और मेरा रेप करते थे।

एक बार उन्होंने मारते हुए मेरे भाई का हाथ तोड़ दिया। पापा की आंखों में डंडा मारा और वह कई दिनों तक ठीक से देख नहीं पाए।’

वे हमेशा हमारी निगरानी करते थे। कोई अकेला बाहर नहीं जा सकता था। सब्जी लाने जाते, पेशाब करने जाते तब भी उनके आदमी हमारे साथ-साथ रहते थे। हम चाहकर भी वहां से भाग नहीं पा रहे थे।’

‘एक दिन, मेरे बड़े पापा को हमारे बारे में खबर लगी। वह पुलिस की मदद से पहुंचे और वहां से किसी तरह हमें निकलवा कर ले आए। वह ना पहुंचते, तो शायद हम वहीं मर जाते’, यह कहते हुए वह रोने लगती हैं।

यहीं से पास के एक गांव फटमाड़ा के प्रेम तांडी बताते हैं, हमारी जिंदगी ठीक चल रही थी, लेकिन बड़े भाई की शादी के लिए पिताजी ने कर्ज ले लिया। हम इसे अभी चुका नहीं पाए और यह बढ़ता चला गया। आज भी हम इसी कर्ज में फंसे हुए हैं।

इस दौरान गांव में एक एजेंट आए। उन्होंने कहा कि हैदराबाद में ईंट-भट्ठे पर काम है। हर मजदूर को 6 महीने में 35 हजार रुपए मिलेंगे और परिवार के एक आदमी को एडवांस पेमेंट। लगा अब हम इससे अपना कर्ज चुका देंगे, लेकिन हमें नहीं पता था कि वहां जाकर सब कुछ गंवा देंगे।

‘वहां ईंट-भट्ठा हमारे लिए एक खुली जेल था। सुबह सूरज निकलने से पहले हमें काम पर लगा दिया जाता था। देर रात तक ईंटें बनवाई जाती थीं। हमसे 14-15 घंटे बिना किसी आराम के काम करवाया जाता था।’

‘कई बार भूखे सोना पड़ता। मालिक और सुपरवाइजर गालियां देते, बेवजह पीटते थे। हमसे कहा गया था कि थकना नहीं है। बीमार होने पर भी काम करना पड़ता था।’

‘इस दौरान मेरे पिताजी को तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ हुई। हमने भट्ठा मालिक से दवाई मांगी तो उसने हंसते हुए कहा कि मरने नहीं देंगे, लेकिन आराम भी नहीं करने देंगे।’

‘उसने पिताजी को दवा दी और काम पर लगा दिया। इसके बाद उनकी हालत और बिगड़ने लगी। उन्हें अस्पताल ले गए, जहां उन्होंने दम तोड़ दिया। हम उनके शव के साथ गांव वापस लौटे। परिवार उजड़ गया, कर्ज जस का तस बना हुआ है। मां भी बीमार रहती हैं। वह पूरी रात सो नहीं पातीं’, यह कहते हुए प्रेम की आंखें भर आती हैं।

गांव फटमाड़ा के प्रेम तांडी बताते हैं, हमारी जिंदगी ठीक चल रही थी, लेकिन बड़े भाई की शादी के लिए पिताजी ने कर्ज लिया। आज भी हम इसी में फंसे हैं।

गांव फटमाड़ा के प्रेम तांडी बताते हैं, हमारी जिंदगी ठीक चल रही थी, लेकिन बड़े भाई की शादी के लिए पिताजी ने कर्ज लिया। आज भी हम इसी में फंसे हैं।

इस इलाके के सामाजिक कार्यकर्ता उमि डेनियल पिछले कई सालों से प्रवासी मजदूरों के लिए काम कर रहे हैं। वह बताते हैं कि 1976 में बना ‘बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम (Bonded Labour Abolition Act)’ इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। इसके बाद कई राज्यों में हजारों मजदूरों को रिहा कराया गया। अकेले ओडिशा में 1980 में लगभग 50,000 मजदूर मुक्त कराए गए थे।

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कानून के अनुसार, राज्य सरकारों को हर तीन साल में बंधुआ मजदूरी का सर्वेक्षण कराना होता है, लेकिन सच्चाई यह है कि ओडिशा समेत कई राज्यों में या तो ये सर्वेक्षण होता नहीं या फिर कागजों पर होकर रह जाता है। जिन लोगों को बचाया जाना चाहिए, वे सालों तक ईंट-भट्ठों की आग में झुलसते हैं।

वह बताते हैं कि हर साल ओडिशा से लगभग 2 लाख लोग काम की तलाश में दक्षिण भारत का रुख करते हैं। इनमें ज्यादातर लोग ईंट-भट्ठों पर काम करते हैं। दलाल इन्हें पैसे का लालच देकर ले जाते हैं और फिर गुलामी में धकेल देते हैं। कई बार यह मानव तस्करी का मामला बन जाता है।

ओडिशा के सामाजिक कार्यकर्ता उमि डेनियल बताते हैं कि हर साल ओडिशा से लगभग 2 लाख लोग काम की तलाश में दक्षिण भारत का रुख करते हैं। इनमें ज्यादातर लोग ईंट-भट्ठों पर काम करते हैं और बंधुआ मजदूर बन जाते हैं।

ओडिशा के सामाजिक कार्यकर्ता उमि डेनियल बताते हैं कि हर साल ओडिशा से लगभग 2 लाख लोग काम की तलाश में दक्षिण भारत का रुख करते हैं। इनमें ज्यादातर लोग ईंट-भट्ठों पर काम करते हैं और बंधुआ मजदूर बन जाते हैं।

डेनियल बताते हैं कि यहां मनरेगा में भी काम नहीं मिलता, क्योंकि लोगों के पास जमीन ही नहीं है। ओडिशा के 93% किसानों के पास 2 एकड़ से भी कम जमीन है। अभी यहां केवल 48% लोग खेती करते हैं, जबकि पहले यह आंकड़ा 60% से अधिक था।

साइक्लोन और बाढ़ की वजह से तटीय इलाकों की खेती बर्बाद हो जाती है। युवा खेती नहीं करना चाहते। वे बाहर काम करने की चाह रखते हैं, लेकिन हुनर की कमी के कारण बंधुआ मजदूरी के जाल में फंस जाते हैं।

ओडिशा सरकार ने दलालों के साथ पलायन करने वाले मजदूरों की पहचान के लिए एक टास्क फोर्स बनाई है, जिसका मकसद मजबूरी में पलायन करने वाले लोगों की पहचान कर उन्हें बचाना है। राज्य सरकार के ‘विजन 2036’ में प्रवास (Migration) को भी मुद्दा माना गया है, जो एक सकारात्मक कदम है।

डेनियल मानते हैं कि अगर इन युवाओं को जरूरी स्किल मिल जाए, तो वे खुद को बंधुआ मजदूर बनने से बचा सकते हैं और आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

दयालु, जिन्हें दलाल रायपुर ले जाने की बात कहकर आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम ले गया और वहां एक जंगल में हाथ काट दिया।

दयालु, जिन्हें दलाल रायपुर ले जाने की बात कहकर आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम ले गया और वहां एक जंगल में हाथ काट दिया।

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