लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक खुली और टेलीविजन डिबेट की अपनी मांग को तेज कर दिया है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो क्लिप साझा करते हुए गांधी ने कहा, “मोदी जी कहीं नहीं जाएंगे, वे बस डिबेट में आएंगे। 73% युवाओं ने इसकी मांग की है।”
4 नवंबर, 2026 को की गई यह ताजा मांग 2 नवंबर, 2026 को दी गई शुरुआती चुनौती के बाद आई है। यह चुनौती प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 31 अक्टूबर को दिए गए उन बयानों के बाद दी गई, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि विपक्षी ताकतें अस्थिरता पैदा करने के लिए विदेशी सहायता का उपयोग कर रही हैं।
डिबेट के विषय और प्रस्ताव
गांधी ने प्रस्ताव दिया है कि डिबेट में इन विषयों को शामिल किया जाए:
- अडानी मामला
- भारत की वित्तीय प्रणाली
- भारत-अमेरिका डील
- “विदेशी प्रभाव” और “राष्ट्रविरोधी” लेबल लगाने के आरोप
उन्होंने सुझाव दिया कि प्रधानमंत्री खुद जगह और मॉडरेटर का चयन करें, और इस भूमिका के लिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का नाम भी प्रस्तावित किया। गांधी ने राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान और योगी आदित्यनाथ सहित भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से भी आग्रह किया है कि वे प्रधानमंत्री को इस निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए मनाएं।
सरकार और भाजपा की प्रतिक्रिया
सरकार और भाजपा नेतृत्व ने लगातार इस प्रस्ताव को खारिज किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार सभी मुद्दों पर बात करने के लिए तैयार है, लेकिन संसद ही ऐसी चर्चाओं के लिए एकमात्र उपयुक्त संवैधानिक मंच है।
संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजीजू ने इस चुनौती को अनुचित बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि परिपक्व व्यक्तियों के बीच उच्च स्तरीय चर्चाएं संसद के भीतर होती हैं। इसी तरह, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने “सड़कों पर” डिबेट करने की अवधारणा की आलोचना की और कहा कि औपचारिक संसदीय कार्यवाही ही सही जगह है।
संगरूर में इंसाफ रैली जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान गांधी इस मांग को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने ऐसे किसी टेलीविजन कार्यक्रम के लिए कोई औपचारिक स्वीकृति या व्यवस्था नहीं की है।









