भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO ने NVS 03 नेविगेशन सैटेलाइट के लॉन्च की तारीख तय कर दी है। इस सैटेलाइट को 30 अक्टूबर, 2026 को रात 11:51 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च किया जाएगा।
इस मिशन का मुख्य उद्देश्य Navigation with Indian Constellation (NavIC) सिस्टम की स्टैंडअलोन पोजिशनिंग क्षमताओं को फिर से बहाल करना है। हाल ही में कुछ विफलताओं के कारण इस सिस्टम में केवल तीन सैटेलाइट ही काम कर रहे थे, जिन्हें अब दोबारा दुरुस्त किया जाएगा।
26 अक्टूबर, 2026 की कई रिपोर्टों ने इस मिशन की समयसीमा की पुष्टि की है। आंध्र प्रदेश में अंतिम तैयारियां शुरू हो गई हैं और अंतरिक्ष एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारियों ने मीडिया को यह जानकारी दी है कि लॉन्च देखने के लिए पब्लिक रजिस्ट्रेशन पहले ही खुल चुका है।
NavIC की दूसरी पीढ़ी और सैटेलाइट की खासियतें
यह सैटेलाइट NavIC अंतरिक्ष यान की दूसरी पीढ़ी का तीसरा हिस्सा है। इससे पहले NVS 01 मिशन पूरा किया जा चुका है, जबकि NVS 02 मॉडल की उड़ान असफल रही थी। इस बार GSLV F18 रॉकेट 2,232 किलोग्राम वजन वाले इस सैटेलाइट को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में ले जाएगा।
इस सैटेलाइट की डिजाइन लाइफ 12 साल तय की गई है। इसमें स्पेस एप्लीकेशन सेंटर द्वारा विकसित स्वदेशी रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक्स का इस्तेमाल किया गया है। उपयोगकर्ता L1, L5 और S बैंड में सिग्नल प्राप्त कर सकेंगे, जिसमें L1 बैंड को खास तौर पर कमर्शियल स्मार्टफोन और नागरिक उपकरणों के साथ बेहतर तालमेल के लिए बनाया गया है।
विदेशी सिस्टम पर निर्भरता कम करने की चुनौती
NavIC का मकसद भारत को अपनी खुद की पोजिशनिंग और टाइमिंग सेवाएं देना है ताकि अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) जैसे विदेशी सिस्टम पर निर्भरता कम हो सके। रक्षा एजेंसियां, समुद्री ऑपरेटर और आपदा प्रबंधन टीमें सुरक्षित नेविगेशन के लिए इस आजादी की जरूरत महसूस करती हैं।
इस नेटवर्क को चलाने के लिए तीन जियोस्टेशनरी और चार इनक्लाइंड जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट की जरूरत होती है। 2026 के मध्य में संसद में दिए गए जवाबों से पता चला कि इस लॉन्च से पहले इस समूह को काफी झटके लगे थे। पहली पीढ़ी के सैटेलाइट्स में इस्तेमाल होने वाली इंपोर्टेड रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक्स में कई बार खराबी आई थी।
विफलताओं का सिलसिला पुराना है, जिसमें शामिल हैं:
- 2017 में IRNSS 1H का लॉन्च असफल रहा था।
- जनवरी 2025 के NVS 02 मिशन में प्रोपल्शन वॉल्व की खराबी के कारण सैटेलाइट ट्रांसफर ऑर्बिट में ही फंस गया और आगे के ऑपरेशन नहीं हो सके।
- फिलहाल केवल तीन सैटेलाइट यानी IRNSS 1B, IRNSS 1I और NVS 01 ही पूरी सेवाएं दे रहे हैं।
बेसिक पोजिशनिंग के लिए कम से कम चार सैटेलाइट की जरूरत होती है, हालांकि टाइमिंग सेवाएं अभी भी चालू हैं। ISRO के दस्तावेजों के अनुसार, टाइमिंग सटीकता 50 नैनोसेकंड के भीतर रहती है और पोजिशन की सटीकता 20 मीटर से बेहतर होने का लक्ष्य है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक प्राथमिक सर्विस एरिया में यह प्रदर्शन 5 से 10 मीटर के बीच रहता है। नेविगेशन की क्वालिटी सुधारने के लिए डुअल फ्रीक्वेंसी सिग्नल का इस्तेमाल किया जाता है ताकि आयनोस्फेरिक गलतियों को कम किया जा सके।
भविष्य के लक्ष्य और परिचालन उम्मीदें
भारतीय सशस्त्र बल और नागरिक तकनीक विकसित करने वाले लोग इन मिशनों पर करीब से नजर रखे हुए हैं। ISRO इसका मुख्य ऑपरेटर है, जबकि प्राइवेट स्टार्टअप्स इन सिग्नलों की वापसी को घरेलू कमर्शियल नेविगेशन के लिए एक बड़े मौके के रूप में देख रहे हैं।
अगर मिशन सफल रहता है, तो सैटेलाइट स्वायत्त बर्न की एक सीरीज के बाद अपनी अंतिम जियोसिंक्रोनस स्थिति में पहुंच जाएगा। इसके बाद कमीशनिंग टीमें सिग्नल्स की जांच करेंगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सिस्टम में जरूरी रिडंडेंसी मौजूद है। विश्लेषकों का कहना है कि सफल लॉन्च केवल एक शुरुआत है, क्योंकि इसके बाद सटीक ऑर्बिटल इंसर्शन, पेलोड टेस्टिंग और सिग्नल कैलिब्रेशन जैसे जटिल कदम उठाने होंगे।
भविष्य की योजनाओं में NVS 04 और NVS 05 मिशन शामिल हैं, ताकि संभावित विफलताओं के खिलाफ इस समूह को और मजबूत बनाया जा सके। उपभोक्ता बाजार पर इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि L1 बैंड रिसीवर कितनी व्यापक पहुंच पाते हैं। ISRO अपने आधिकारिक चैनलों पर GSLV F18 के liftoff का सीधा प्रसारण करेगा। लॉन्च के बाद इंजीनियर सैटेलाइट की सही जगह तय करने के लिए ऑर्बिटल मैनोव्यूअर्स करेंगे। चार सैटेलाइट की संख्या पूरी होने से यह सिस्टम अपने बेसिक फंक्शनल बेसलाइन पर वापस आ जाएगा। इंडिया टुडे, द प्रिंट, न्यूज9लाइव और इंडियन एक्सप्रेस जैसे आउटलेट्स के अनुसार एजेंसी 30 अक्टूबर की समयसीमा तक अपडेट देना जारी रखेगी।









