भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर, 2026 को यह घोषणा की है कि बच्चों के लिए इंटरनेट का उपयोग करना एक मौलिक अधिकार है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब अधिकारी पूरी तरह से इंटरनेट बंद नहीं कर पाएंगे, क्योंकि इससे बच्चों की पढ़ाई और उनके विकास पर बुरा असर पड़ता है।
जस्टिस और कानूनी जानकारों का मानना है कि इस फैसले से राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और व्यक्ति के डिजिटल अधिकारों के बीच का रिश्ता पूरी तरह बदल जाएगा। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक शिक्षा और सामाजिक भागीदारी के लिए बच्चों का इंटरनेट से जुड़ा रहना बहुत जरूरी है।
अदालत ने माना है कि डिजिटल दुनिया तक पहुंच अब संविधान के तहत शिक्षा के अधिकार का ही एक हिस्सा है। इस फैसले का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सुरक्षा के नाम पर बच्चों के भविष्य के साथ समझौता न हो।
इंटरनेट बंद करने के लिए नए नियम और शर्तें
कोर्ट ने सार्वजनिक अशांति के समय कनेक्टिविटी पर पाबंदी लगाने के लिए कुछ खास गाइडलाइन्स तय की हैं। अब अधिकारियों को किसी भी नेटवर्क शटडाउन पर विचार करने से पहले उसकी गहराई से जांच करनी होगी।
प्रशासन को अब यह बताना होगा कि इंटरनेट कितने समय के लिए बंद रखा जाएगा। साथ ही उन्हें सबूत देने होंगे कि क्या इंटरनेट बंद करने के अलावा कोई और कम सख्त तरीका अपनाया जा सकता था। डिजिटल एक्सेस पर किसी भी तरह की पाबंदी के लिए ‘आनुपातिकता’ (proportionality) को मुख्य आधार माना जाएगा।
LiveLaw की रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट ने पूरी तरह से इंटरनेट बंद करने के फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया है। बेंच ने साफ कहा कि ऐसे कदमों से छात्रों की प्रगति को ऐसी क्षति होती है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। The Wire द्वारा दिए गए हवाले के अनुसार, स्थानीय तनाव के समय भी शिक्षा का काम नहीं रुकना चाहिए।
सरकारी नीतियों और सुरक्षा नियमों में बदलाव
इस फैसले के बाद अब राज्य सरकारों को कानून व्यवस्था संभालने के अपने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) में बदलाव करना होगा। कोर्ट ने आदेश दिया है कि स्कूलों और उन घरों को प्राथमिकता दी जाए जहां छात्र रहते हैं, ताकि वहां इंटरनेट कनेक्टिविटी बनी रहे।
अगर प्रशासन को लगता है कि इंटरनेट बंद करना बहुत जरूरी है, तो भी उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि शैक्षिक पोर्टल्स के लिए कम बैंडविड्थ वाले वैकल्पिक लिंक चालू रहें। Business Standard के आंकड़े बताते हैं कि इस निर्णय से भारत अब बच्चों के अधिकारों के मामले में वैश्विक मानकों के बराबर आ गया है।
शैक्षणिक संस्थानों ने बेंच द्वारा दी गई इस स्पष्टता का स्वागत किया है। India Today के अनुसार, अब राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति एक ऐसा नजरिया अपनाया जाएगा जिसमें सुरक्षा और सूचना तक पहुंच की बुनियादी जरूरत के बीच संतुलन हो।
- केंद्र सरकार अगले एक महीने के भीतर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस आदेश के पालन के लिए नोटिफिकेशन जारी करेगी।
- कानूनी जानकारों का मानना है कि अब ध्यान इस बात पर जाएगा कि स्थानीय स्तर पर इंटरनेट बंद करने की तकनीकी व्यवस्था कैसे की जाए।
- भविष्य में इंटरनेट पाबंदियों के खिलाफ होने वाली कानूनी चुनौतियों में इस फैसले का उदाहरण दिया जाएगा कि यह युवाओं के विकास के अधिकारों का उल्लंघन है।
कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जनवरी 2027 तक एक स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। इस रिपोर्ट के जरिए यह देखा जाएगा कि जमीन पर इन नई गाइडलाइन्स को प्रभावी ढंग से लागू किया गया है या नहीं।









