8 अक्टूबर 2026 को समाजवादी पार्टी ने लखनऊ के जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय पर एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन पार्टी के एक हफ्ते तक चले ‘लोकतंत्र बचाओ सप्ताह, वोट बचाओ-देश बचाओ’ अभियान के समापन के अवसर पर किया गया। यह विशेष अभियान 2 अक्टूबर से शुरू होकर 8 अक्टूबर तक चला था।
इस पूरे विरोध प्रदर्शन का मुख्य निशाना मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और भारत निर्वाचन आयोग था। समाजवादी पार्टी ने वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में पक्षपात और भारी गड़बड़ियों के गंभीर आरोप लगाए हैं।
लखनऊ में हुए इस प्रदर्शन के दौरान पार्टी के कई बड़े नेता शामिल हुए। इनमें मोनिका नाज़ खान और मेट्रोपॉलिटन प्रेसिडेंट शब्बीर अब्बास जैसे प्रमुख चेहरे नजर आए। इन नेताओं ने कलेक्ट्रेट तक मार्च निकाला और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की।
उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में जोरदार प्रदर्शन
लखनऊ के अलावा उत्तर प्रदेश के कई अन्य शहरों में भी इसी तरह के विरोध प्रदर्शन देखे गए। आगरा में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सुभाष पार्क से कलेक्ट्रेट तक मार्च किया। इस दौरान कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच तीखी बहस और टकराव की स्थिति बनी रही।
आगरा से जुड़ी खबरों में यह भी सामने आया कि राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन को उनके घर में नजरबंद कर दिया गया था। वहीं संभल में कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट गेट पर मुख्य चुनाव आयुक्त का पुतला फूंका। इस प्रदर्शन में संभल के कई स्थानीय सपा विधायक भी शामिल हुए।
वाराणसी में समाजवादी पार्टी और नेशनल इक्वल पार्टी ने मिलकर संयुक्त विरोध प्रदर्शन किया। इन दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव आयुक्त का पुतला जलाया। कानपुर में भी एक बड़ा जत्था जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय की ओर निकला, जिसका नेतृत्व सिटी प्रेसिडेंट फजल महमूद और विधायक अमिताभ वाजपेयी व हसन रूमी ने किया।
PDA समुदाय के वोट कटने का आरोप और कानूनी प्रक्रिया
सुल्तानपुर में समाजवादी पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने जिला मजिस्ट्रेट से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान उन्होंने फॉर्म-7 के जरिए एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। पार्टी का आरोप है कि PDA (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) समुदायों के मतदाताओं के नाम अवैध रूप से वोटर लिस्ट से हटाए जा रहे हैं।
जिला मजिस्ट्रेट ने इस शिकायत पर संज्ञान लिया और भरोसा दिया कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी। इस बीच सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा ने निर्वाचन आयोग पर कड़ा हमला बोलते हुए उसे “वोट चोर आयोग” कहा। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग केवल भाजपा सरकार के हितों को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने पक्षपात के सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। आयोग ने कहा कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े फैसले आपसी सहमति से लिए गए थे और आंतरिक विचार-विमर्श एक मानक प्रक्रिया है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी राजनीतिक प्रतिनिधि यदि मुलाकात करना चाहता है, तो उसे निर्धारित प्रशासनिक नियमों का पालन करना होगा।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का संवैधानिक तरीका
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग पर आयोग ने स्पष्ट किया कि यह पूरी प्रक्रिया संविधान द्वारा तय की गई है। कानूनी ढांचे के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।
इस संवैधानिक प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी होनी जरूरी हैं:
- लोकसभा के कम से कम 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों द्वारा प्रस्ताव लाना होगा।
- प्रस्ताव के बाद राष्ट्रपति द्वारा अंतिम आदेश जारी किया जाना आवश्यक है।
आयोग ने नियुक्ति प्रक्रिया की जानकारी देते हुए बताया कि इसमें एक चयन समिति शामिल होती है। इस समिति में प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।









