India Meteorological Department (IMD) और Indian Institute of Tropical Meteorology की एक नई स्टडी से पता चला है कि पिछले 70 सालों में उत्तर भारत अधिक गर्म और सूखा हो गया है, जबकि प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की मात्रा बढ़ी है। ये बदलाव देश के कुल भूमि क्षेत्र के 7% हिस्से को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे महत्वपूर्ण खेती वाले क्षेत्रों में कृषि स्थिरता को खतरा हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने इन निष्कर्षों को अक्टूबर 2026 के पीयर रिव्यूड जर्नल MAUSAM में प्रकाशित किया है। IMD पुणे की अनन्या करमकर के नेतृत्व में शोध टीम ने 1951 से 2020 तक के जलवायु रिकॉर्ड का विश्लेषण किया। इस मूल्यांकन में बदलावों को मापने के लिए Köppen-Geiger वर्गीकरण प्रणाली का इस्तेमाल किया गया।
उत्तर और दक्षिण भारत के मौसम में बदलाव
डेटा से उत्तर-पश्चिमी भारत में एक स्पष्ट बदलाव दिखा है। गर्म अर्ध-शुष्क क्षेत्र 1951 से 1980 के दौरान इस क्षेत्र के लगभग 25.7% से बढ़कर 1991 से 2020 की अवधि में करीब 33.1% हो गया है। वहीं, समशीतोष्ण क्षेत्र 25.8% से घटकर 18.7% रह गया है। 29 अक्टूबर 2026 को Hindustan Times में छपी रिपोर्ट के अनुसार, ये बदलाव बढ़ते तापमान और घटती बारिश के कारण हुए हैं।
स्टडी बताती है कि सूखे क्षेत्र का पूर्वी किनारा अब पूर्वी उत्तर प्रदेश तक बढ़ गया है। मुख्य लेखिका अनन्या करमकर ने कहा कि इस महत्वपूर्ण खेती वाले क्षेत्र में बुआई और कटाई के समय की बारीकी से निगरानी करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि दशक दर दशक सबसे स्पष्ट बदलाव इस गर्म और सूखे क्षेत्र का पूर्व की ओर बढ़ना रहा है।
प्रायद्वीपीय भारत में अलग रुझान देखा गया। यहाँ गर्म अर्ध-शुष्क क्षेत्र 30.3% से घटकर 16.4% हो गया और यह क्षेत्र काफी हद तक ट्रॉपिकल सवाना जोन में बदल गया। अब यह जोन प्रायद्वीप के 75.7% हिस्से को कवर करता है। शोधकर्ताओं ने इस बदलाव का मुख्य कारण पिछले कई दशकों में दर्ज की गई अधिक बारिश को बताया है।
अन्य क्षेत्रों की स्थिति और जलवायु प्रभाव
अन्य इलाकों में भी जलवायु बदलाव देखे गए हैं:
- उत्तर-पूर्व भारत में ट्रॉपिकल सवाना जोन कम हुआ और समशीतोष्ण क्षेत्र बढ़े।
- मराठवाड़ा और पश्चिम विदर्भ ट्रॉपिकल सवाना से बदलकर गर्म अर्ध-शुष्क स्थितियों में चले गए।
रिसर्च के मुताबिक, यह बदलाव दिन और रात के बढ़ते तापमान से जुड़ा है। उत्तर भारत के इंडो-गांगेटिक मैदानी इलाकों में सूखे की प्रवृत्ति Victoria Mode के नकारात्मक चरण से जुड़ी है। 24 अक्टूबर 2026 को The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, यह उत्तरी प्रशांत समुद्री सतह के तापमान का पैटर्न है, जो नमी के परिवहन को कम करता है और इस क्षेत्र में विचलन पैदा करता है। यह नकारात्मक चरण Pacific Decadal Oscillation से अलग है।
स्टडी के सह-लेखक और IMD के महानिदेशक मृत्युंजय মহাপাত্র ने चेतावनी दी कि एक ही जीवनकाल के भीतर जलवायु क्षेत्रों में होने वाले ये बदलाव भविष्य की किसान सलाह के लिए मार्गदर्शक होने चाहिए। लेखकों ने कहा कि ट्रॉपिकल सवाना और समशीतोष्ण क्षेत्रों के लगातार घटने से खाद्य सुरक्षा और स्थानीय आबादी के विस्थापन से जुड़ी कई समस्याएं पैदा होंगी।
The Indian Express, Times of India और NDTV ने भी 23 और 24 अक्टूबर 2026 के बीच इन निष्कर्षों को सार्वजनिक होने के बाद रिपोर्ट किया है। अब IMD इन अपडेटेड जलवायु-क्षेत्र जानकारियों को अपने पूर्वानुमान और कृषि-सलाह प्रणालियों में शामिल करेगा। उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों के राज्य कृषि विभाग अपने सूखे की आकस्मिक योजनाओं और फसल कैलेंडर में बदलाव कर सकते हैं। शोधकर्ता अब पर्यावरणीय रुझानों को बेहतर समझने के लिए हाई-रिज़ॉल्यूशन डाउनस्केलिंग और Victoria Mode टेलीकनेक्शन पर आगे अध्ययन करेंगे।









