सुप्रीम कोर्ट ने Yes Bank, Reserve Bank of India (RBI) और केंद्र सरकार द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया है। इस फैसले के साथ ही अदालत ने Additional Tier 1 (AT 1) बॉन्ड से जुड़े 8,415 करोड़ रुपये के राइट ऑफ (खाते से हटाने) को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा है।
15 अक्टूबर 2026 को आए इस महत्वपूर्ण फैसले से उन हजारों बॉन्डधारकों की उम्मीदें फिर से जाग गई हैं, जिनके निवेश को बैंक के 2020 के बचाव अभियान के दौरान खत्म कर दिया गया था। इस कानूनी जीत के बाद अब उन निवेशकों के दावों को फिर से मान्यता मिली है।
कोर्ट के इस आदेश का शेयर बाजार पर तुरंत और गहरा असर देखने को मिला। Yes Bank के शेयरों में करीब 15 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई, क्योंकि निवेशक इस फैसले से होने वाले वित्तीय नुकसान का आकलन कर रहे थे।
शेयर बाजार और बैंक की वित्तीय स्थिति पर असर
बाजार में इस खबर के बाद ट्रेडिंग वॉल्यूम 600 मिलियन शेयरों से ज्यादा रहा। इस एक ही सत्र के दौरान कंपनी का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग 10,000 करोड़ रुपये घट गया। इसके बाद बैंक का मार्केट कैप 56,500 से 57,000 करोड़ रुपये की रेंज के करीब पहुंच गया।
यह पूरा मामला 2020 की शुरुआत का है जब Yes Bank अपनी खराब स्थिति के कारण लगभग खत्म होने की कगार पर था। उस समय बैंक में हाई नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA), पूंजी की कमी और गवर्नेंस से जुड़ी बड़ी विफलताएं सामने आई थीं।
स्थिति को संभालने के लिए Reserve Bank of India ने 5 मार्च 2020 को बैंक बोर्ड को हटा दिया था। आरबीआई ने एक प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर) नियुक्त किया ताकि रिकंस्ट्रक्शन स्कीम की निगरानी की जा सके। इसी योजना के तहत 8,415 करोड़ रुपये के AT 1 बॉन्ड पोर्टफोलियो को जीरो कर दिया गया था, जो देश में इस तरह का पहला मामला था।
बॉन्डधारकों की कानूनी लड़ाई और कोर्ट का फैसला
इस राइट ऑफ के खिलाफ Axis Trustee Services जैसे दलों द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए रिटेल निवेशकों और संस्थागत निवेशकों ने कानूनी चुनौती दी थी। बॉन्डधारकों ने इस पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाए थे।
जनवरी 2023 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस फैसले को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि रिकंस्ट्रक्शन स्कीम के तहत प्रशासक के पास इन कर्ज उपकरणों (डेट इंस्ट्रूमेंट्स) को मिटाने का कोई खास अधिकार नहीं था।
इसके बाद Yes Bank, केंद्र सरकार और आरबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिसके बाद निचली अदालत के आदेश पर रोक लगा दी गई थी। अंत में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस Dipankar Datta और Augustine George Masih ने मेरिट के आधार पर इन अपीलों को खारिज कर दिया।
LiveLaw और अन्य कानूनी समाचार माध्यमों की रिपोर्ट्स के अनुसार, बेंच ने पाया कि प्रशासक ने अंतिम स्कीम में जरूरी प्रावधानों के बिना यह कदम उठाया था। अदालत ने माना कि यह राइट ऑफ मास्टर सर्कुलर और बॉन्ड के इंफॉर्मेशन मेमोरेंडम की शर्तों के खिलाफ था।
प्रभावित बॉन्ड और निवेशकों का विवरण
इस मामले में दो खास तरह के बॉन्ड ट्रेंच शामिल थे, जिनका विवरण इस प्रकार है:
- एक 3,000 करोड़ रुपये का इश्यू था, जिस पर 9.5 प्रतिशत की कूपन दर थी।
- दूसरा 5,415 करोड़ रुपये का इश्यू था, जिसमें 9 प्रतिशत की कूपन दर दी गई थी।
इन बॉन्ड्स को Nippon, Kotak और Franklin Templeton जैसे बड़े म्यूचुअल फंड्स ने खरीदा था। इसके अलावा लगभग 1,300 से 1,346 व्यक्तिगत रिटेल निवेशक भी इसमें शामिल थे। इन छोटे निवेशकों को अक्सर यह उत्पाद फिक्स्ड डिपॉजिट के मुकाबले ज्यादा रिटर्न देने वाले विकल्प के रूप में बेचा गया था।
बैंक की बैलेंस शीट और भविष्य की चुनौतियां
सीनियर एडवोकेट H.P. Ranina ने बताया कि अब यह पूरी देनदारी वापस बैंक संस्थान पर आ गई है। उन्होंने कहा कि यदि जापानी निवेशक Sumitomo Mitsui Banking Corporation, जिसकी बैंक में करीब 24.9 प्रतिशत हिस्सेदारी है, को पुरानी देनदारियों से बचाया जाता है, तो मौजूदा शेयरधारकों को राइट्स इश्यू जैसे माध्यमों से यह बोझ उठाना पड़ सकता है।
बॉन्डधारकों की तरफ से पेश वकील Srijan Sinha ने पहले ही इस राइट ऑफ को अवैध और मनमाना बताया था। अब सबसे बड़ी चिंता यह है कि बैंक इस पूंजी दबाव को कैसे मैनेज करेगा।
विश्लेषकों का मानना है कि एक ग्लोबल सिस्टमिकली इम्पोर्टेंट बैंक का प्रमुख शेयरधारक होना स्थिरता दे सकता है, लेकिन दावों के निपटान के लिए बैंक को नई पूंजी जुटानी पड़ सकती है।
पुनर्भुगतान या मुआवजे का सटीक तरीका जजमेंट के विस्तृत टेक्स्ट पर निर्भर करेगा। फिलहाल बाजार बैंक मैनेजमेंट की आधिकारिक टिप्पणी और Reserve Bank of India के रेजोल्यूशन फ्रेमवर्क के दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रहा है।
रेटिंग फर्म और रेगुलेटरी एजेंसियां अब यह जांचेंगी कि इस फैसले का कैपिटल इंस्ट्रूमेंट्स के ट्रीटमेंट पर क्या असर पड़ेगा। साथ ही, Securities and Exchange Board of India (SEBI) द्वारा मिस-सेलिंग के आरोपों पर शुरू की गई संबंधित कार्यवाइयों की स्थिति भी भविष्य की कानूनी प्रक्रियाओं से स्पष्ट होगी।









