INDIA गठबंधन के नेताओं ने 12 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की है। इस याचिका के जरिए उन्होंने मतदाता सूचियों के चल रहे विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision) को चुनौती दी है।
इस कानूनी कार्रवाई के साथ ही नई दिल्ली में जंतर मंतर स्थल पर विरोध प्रदर्शनों तक पहुंच को प्रतिबंधित करने वाले पुलिस के एक महत्वपूर्ण आदेश का समय भी जुड़ा है। इस मामले में याचिकाकर्ताओं में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हैं।
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने संशोधन प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की है। इसके अलावा, याचिका में मतदाता नामों को हटाए जाने की स्वतंत्र ऑडिट और मनमाने ढंग से नाम हटाने के खिलाफ नए सुरक्षा उपायों की मांग की गई है।
याचिका में तकनीकी खामियां और रजिस्ट्री की आपत्ति
Bar and Bench, Times Now और India Today जैसे कई स्रोतों द्वारा सत्यापित रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने जमा किए गए याचिका दस्तावेजों में 14 प्रक्रियात्मक खामियां पाई हैं। इनमें से एक मुख्य समस्या 220 रुपये की कोर्ट फीस की कमी है।
इसके अलावा, नौ याचिकाकर्ताओं के वकालतनामा या तो गायब हैं या उन पर हस्ताक्षर नहीं किए गए हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान प्रमाण जैसे दस्तावेजों में पठनीयता की समस्या भी पाई गई है।
अधिकारियों ने व्यक्तिगत चुनाव आयुक्तों को प्रतिवादी के रूप में नामित करने के संबंध में भी कठिनाइयों का उल्लेख किया है। कोर्ट द्वारा मामले की सुनवाई के लिए लिस्टिंग किए जाने से पहले इन सभी त्रुटियों को ठीक करना जरूरी होगा।
जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन पर पाबंदी
दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने 11 अक्टूबर 2026 को एक स्थायी आदेश जारी किया, जिसने जंतर मंतर को एक नामित विरोध स्थल के रूप में हटा दिया है। यह आदेश गृह मंत्रालय की एक समिति द्वारा दी गई सिफारिशों के आधार पर आया है।
यह नया आदेश 28 अप्रैल 2022 को जारी किए गए पिछले स्थायी आदेश में आंशिक बदलाव करता है। अब प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड या CBD ग्राउंड जैसे वैकल्पिक स्थानों का उपयोग करने का निर्देश दिया गया है।
इससे पहले, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस मामले पर प्रशासनिक बैठक करने की विपक्षी नेताओं की मांग को खारिज कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि ये मुद्दे अभी विचाराधीन (sub judice) हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी नागरिकों के लिए न्यायिक रास्ता खुला है।
चुनाव आयोग की प्रक्रिया और विपक्ष के आरोप
चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को देशव्यापी विशेष गहन संशोधन शुरू किया था। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जा रहे हैं और इसमें पारदर्शिता की भारी कमी है।
विपक्ष का यह भी दावा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा एकतरफा फैसले लिए जा रहे हैं। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और संशोधन अभ्यास को पूरी तरह रोकने की मांग की है।
पारदर्शिता के लिए कोर्ट से की गई 10 मांगें
कानूनी याचिका में अदालत से दस विशिष्ट दिशा-निर्देशों की एक विस्तृत सूची मांगी गई है। याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:
- 24 जून 2025 के निर्णय से संबंधित चुनाव आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड, एजेंडा, मिनट और नोटिंग का सार्वजनिक खुलासा किया जाए।
- सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति बनाई जाए, जो डेटाबेस एक्सेस और हटाए गए नामों की ऑडिट करे।
- हटाए गए नामों को बूथवार प्रकाशित किया जाए, जिसमें हर नाम हटाने का कारण और जनसांख्यिकीय विवरण शामिल हो।
- भविष्य के सभी फैसलों के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का सख्ती से पालन किया जाए।
- मतदाताओं को सुरक्षा दी जाए कि बिना पूर्व सूचना और सुनवाई के उचित अवसर के कोई भी नाम न हटाया जाए।
ये मांगें मतदाता सूचियों की अखंडता को लेकर व्यापक चिंताओं को दर्शाती हैं। संवैधानिक वकीलों का कहना है कि अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को पूर्ण शक्तियां देता है, लेकिन मनमानेपन के मामले में ये न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।
विपक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाली कानूनी टीम अब रजिस्ट्री की खामियों को दूर करने की तैयारी कर रही है ताकि कोर्ट में सुनवाई का रास्ता साफ हो सके। भविष्य की कार्यवाही इन दस्तावेजों के सुधार और उसके बाद आने वाले न्यायिक आदेशों पर निर्भर करेगी। इस बीच, राजनीतिक दल राजधानी में आवंटित नए स्थानों पर अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखने का इरादा रखते हैं।









