भारत को अपने महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए 2027 और 2030 वित्तीय वर्षों के बीच क्लीन एनर्जी निवेश में 220 बिलियन डॉलर जुटाने होंगे। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने 28 अक्टूबर, 2026 को इस आवश्यकता की पुष्टि की।
देश 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। फिलहाल गैर-जीवाश्म क्षमता लगभग 308 गीगावाट है। सरकारी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सोलर, विंड और स्टोरेज सेक्टर में आक्रामक विस्तार के साथ-साथ जटिल ट्रांसमिशन नेटवर्क बनाने की जरूरत है।
Reuters, The Hindu, Business Standard और CNBC-TV18 की रिपोर्टों में अगले चार वर्षों के लिए इस 220 बिलियन डॉलर की राशि को एक महत्वपूर्ण आधार माना गया है। एक विस्तृत वित्तीय विवरण में बताया गया है कि बुनियादी ढांचे और विकास के लिए इस फंड को सेक्टर में कैसे बांटा जाएगा।
पूंजी आवंटन और विकास लक्ष्य
एक विश्वसनीय एनर्जी ग्रिड सुनिश्चित करने के लिए कई प्रमुख बुनियादी ढांचे और तकनीक क्षेत्रों में निवेश की जरूरत है। मंत्रालय ने दशक के अंत तक 500 गीगावाट के मील के पत्थर को छूने के लिए निम्नलिखित अनुमानित पूंजी आवश्यकताओं का सुझाव दिया है:
- सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए 70 से 75 बिलियन डॉलर।
- ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 40 से 45 बिलियन डॉलर।
- विंड एनर्जी विकास के लिए 25 से 30 बिलियन डॉलर।
- ग्रीन हाइड्रोजन पहल के लिए 20 से 25 बिलियन डॉलर।
- मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विस्तार के लिए 15 से 20 बिलियन डॉलर।
इन आंकड़ों में बायोएनर्जी, हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर और विभिन्न स्टोरेज समाधानों के लिए आवश्यक अतिरिक्त पूंजी शामिल नहीं है। डेवलपर्स और मैन्युफैक्चरर्स ने पहले ही रफ्तार दिखाई है, जिससे 2024 और 2026 के बीच निजी निवेश लगभग 64 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस कुल राशि में 6.2 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश शामिल है।
एनर्जी विश्लेषकों का मानना है कि इस बदलाव में ट्रांसमिशन और स्टोरेज क्षमता मुख्य बाधाएं हैं। मंत्रालय के लिए वर्तमान में ग्राहकों की प्रतीक्षा कर रहे लगभग 40 गीगावाट के प्रोजेक्ट्स की समस्या को सुलझाना एक केंद्रीय चिंता बनी हुई है। उम्मीद है कि स्पष्ट नीति ढांचे और मजबूत भुगतान सुरक्षा तंत्र से भविष्य के निवेशकों के लिए इन संपत्तियों की बैंकबिलिटी में सुधार होगा।
इस बदलाव में सरकारी एजेंसियां, निजी मैन्युफैक्चरर्स और राज्य डिस्कॉम जैसे कई हितधारक शामिल हैं। जैसे-जैसे भारत जीवाश्म ईंधन आयात पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, ग्रीन अमोनिया उत्पादन जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए अंतरराष्ट्रीय निवेशक अनिवार्य बने हुए हैं।
रणनीतिक दृष्टिकोण और अगले कदम
प्रगति अब आगामी भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट और एक्सपो से जुड़ी है। अधिकारी इस मंच का उपयोग औपचारिक फाइनेंसिंग रोडमैप और फंडिंग गैप को भरने में बहुपक्षीय संस्थानों की संभावित भूमिका पर चर्चा करने के लिए करेंगे।
सरकार जब स्टोरेज इंसेंटिव और ऑफटेक सिक्योरिटी के संबंध में नए नीतिगत उपाय अंतिम रूप देगी, तब इन निवेश प्रवाह की निगरानी जारी रहेगी। इन क्षेत्रों में सफलता से 2070 तक भारत के नेट-जीरो लक्ष्य को समर्थन मिलने का अनुमान है, साथ ही मैन्युफैक्चरर्स और रिन्यूएबल डेवलपर्स के लिए आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। ग्रिड के इस तीव्र बदलाव के दौरान, जो प्रोजेक्ट्स ग्राहक सुरक्षित करने में विफल रहेंगे, उनके बेकार संपत्ति (स्ट्रैंडेड एसेट्स) बनने का जोखिम है।









