भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 27 अक्टूबर 2026 को निजी अस्पतालों द्वारा दवाओं की कीमतों में की जाने वाली भारी बढ़ोतरी को डकैती करार दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह तीखी टिप्पणी तब की, जब वे मेडिकल सुविधाओं में फार्मास्युटिकल कीमतों के नियमन से जुड़ी पुरानी याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख रहे थे।
अदालत की यह सख्त जांच एक खास मामले के बाद शुरू हुई। इस मामले में एक अस्पताल ने एक मरीज से कीमोथेरेपी इंजेक्शन के लिए 1,30,000 रुपये वसूले थे। मरीज खुद एक मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर है, जिसने अदालत को बताया कि वही इंजेक्शन वह डीलर प्राइस पर मात्र 11,000 रुपये में ले सकता था।
सुनवाई के दौरान बेंच ने कीमतों में इतने बड़े अंतर पर स्पष्टीकरण मांगा। कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि इस तरह की भारी रकम आखिर कहां भेजी जा रही है। CNBC-TV18 और अन्य मीडिया आउटलेट्स की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत निगरानी की मौजूदा स्थिति को लेकर गहरी निराशा व्यक्त कर रही थी।
दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और सरकारी तंत्र की विफलता
जजों ने अपनी टिप्पणी में कहा कि नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) अपने वर्तमान स्वरूप में पूरी तरह से निष्क्रिय नजर आती है। इससे पहले की सुनवाइयों में भी इसी तरह की विसंगतियां सामने आई थीं। एक उदाहरण में बताया गया कि एक कैंसर की दवा खुद रिटेलर्स को करीब 2,700 रुपये में दी गई थी, लेकिन बाद में उसकी रिटेल कीमत 27,000 रुपये तक पहुंच गई।
वर्तमान में ड्रग प्राइसेस कंट्रोल ऑर्डर 2013 के तहत उपभोक्ताओं को बहुत सीमित सुरक्षा मिलती है। शेड्यूल्ड या जरूरी दवाओं के लिए रिटेलर का मार्जिन 16 प्रतिशत तय किया गया है। हालांकि, नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं के लिए केवल 10 प्रतिशत वार्षिक मूल्य वृद्धि की सीमा है, जिससे ज्यादातर ब्रांड्स सख्त नियंत्रण से बाहर रह जाते हैं।
सरकार के प्रस्ताव और अस्पतालों की दलीलें
केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि कैंसर रोधी दवाओं पर अस्पतालों द्वारा की जाने वाली बढ़ोतरी अक्सर 170 प्रतिशत से 700 प्रतिशत के बीच होती है। केंद्र की ओर से पेश हुई एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि सरकार चुनिंदा नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर रोधी दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड-मार्जिन कैप लगाने का प्रस्ताव कर रही है।
अधिकारियों का अनुमान है कि इस कदम से कुछ लागतों में 20 से 70 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। इससे मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने की उम्मीद है। इसके बावजूद, कोर्ट इस बात से संतुष्ट नहीं दिखा कि ये कैप अस्पताल की फार्मेसी प्रथाओं के पूरे दायरे को कवर नहीं करते हैं।
दूसरी ओर, अस्पतालों ने दलील दी कि यह मार्जिन सरकारी योजनाओं या बीमा के तहत आने वाले मरीजों के इलाज के लिए जरूरी है, क्योंकि वहां प्रतिपूर्ति कम दरों पर होती है। अस्पतालों की पैरवी कर रहे सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कहा कि दवाओं की कीमत को स्वास्थ्य सेवा वितरण की व्यापक लागतों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने 24 घंटे बुनियादी ढांचे के रखरखाव की उच्च लागत का भी हवाला दिया।
अंतिम फैसले की दिशा और कानूनी मांगें
अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि अस्पताल अपनी संचालन लागत को उस तरीके से पूरा कर सकते हैं जिसे कोर्ट ने ‘लूट’ कहा है। पारदर्शिता कार्यकर्ता किशन चंद जैन और अन्य याचिकाकर्ता इन बढ़ी हुई कीमतों को रोकने के लिए एक अधिक मजबूत नियामक माहौल की मांग कर रहे हैं।
अब मुख्य सवाल यह है कि क्या अदालत एक सार्वभौमिक ट्रेड-मार्जिन कैप लागू करेगी या नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी को विशिष्ट निर्देश जारी करेगी। मंत्रालय ने संकेत दिया है कि वह उन कैंसर दवाओं की सूची अधिसूचित करेगा जिन पर नया 30 प्रतिशत कैप लागू होगा।
मरीज और उनके परिवार इन प्रशासनिक अपडेट्स और अंतिम न्यायिक आदेश का इंतजार कर रहे हैं। बेंच का निर्णायक फैसला आने वाले कुछ हफ्तों में आने की उम्मीद है। बार एंड बेंच और मनीकंट्रोल में उद्धृत कानूनी विशेषज्ञों और उद्योग पर्यवेक्षकों का कहना है कि मूल्य निर्धारण नीति में किसी भी अचानक बदलाव से भविष्य के उद्योग निवेश और देश भर में दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।









