भारत में 9 नवंबर 2026 से 137 नॉन शेड्यूल्ड कैंसर रोधी दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर 30 प्रतिशत की सीमा लागू की जाएगी। इस नियामक कदम का मुख्य उद्देश्य मरीजों के लिए अधिकतम खुदरा कीमतों (MRP) को कम करना है।
इस फैसले से दवाओं की कीमतों में 70 प्रतिशत तक की कमी आने की उम्मीद है। अनुमान है कि इससे सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होगी। National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) ने 17 अक्टूबर 2026 को गजट ऑर्डर S.O. 5690(E) के जरिए इस निर्णय को औपचारिक रूप दिया है।
यह नई पॉलिसी 2019 के एक पायलट प्रोग्राम पर आधारित है। उस प्रोग्राम में 42 दवाओं के मार्जिन को सफलतापूर्वक सीमित किया गया था। NPPA और Mint के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में भारत में नॉन शेड्यूल्ड ऑन्कोलॉजी मार्केट में कोई अधिकतम मूल्य सीमा तय नहीं है।
दवाओं की कीमतों और मार्केट पर असर
NPPA की आंतरिक मीटिंग के मिनट्स से पता चला है कि इन दवाओं पर ट्रेड मार्कअप ऐतिहासिक रूप से 700 प्रतिशत तक पहुंच गया था। इस पूरे मार्केट में लगभग 225 दवाएं और 500 फॉर्मूलेशन शामिल हैं। इस मार्केट का सालाना टर्नओवर करीब 12,500 करोड़ रुपये है।
नए नियमों के मुताबिक, 30 प्रतिशत का ट्रेड मार्जिन GST को छोड़कर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पर लागू होगा। 17 अक्टूबर की अधिसूचना के अनुसार, यह स्टॉकिस्ट की कीमत पर 42.86 प्रतिशत के मार्कअप के बराबर है।
इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि यदि कोई दवा पहले 300 रुपये में बिक रही थी और स्टॉकिस्ट की कीमत 70 रुपये थी, तो अब उसकी अधिकतम खुदरा कीमत टैक्स के साथ 100 रुपये होगी। नोटिफिकेशन के बाद निर्माताओं के लिए कुछ सख्त प्रक्रियाएं तय की गई हैं।
दवा बनाने वाली कंपनियों को सात दिनों के भीतर संशोधित कीमतें NPPA और राज्य ड्रग कंट्रोलर्स को भेजनी होंगी। कंपनियों को इन नई सूचियों को प्रकाशित करना होगा और कीमतों में हुई कटौती का विज्ञापन भी देना होगा। Business Standard और The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल और फार्मेसी लेवल पर इन नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य अधिकारियों की होगी।
जीवन रक्षक दवाओं की सूची और छूट
इस पहल में कई तरह की जीवन रक्षक दवाएं शामिल की गई हैं। यह सूची कैंसर के 20 से अधिक अलग-अलग प्रकारों के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली थेरेपी को कवर करती है। इसमें pembrolizumab, nivolumab, osimertinib और atezolizumab जैसी महत्वपूर्ण दवाएं शामिल हैं।
NPPA के आधिकारिक दिशा-निर्देशों के अनुसार, पेशेंट असिस्टेंस प्रोग्राम्स को इन नई मूल्य सीमाओं से बाहर रखा गया है। ये वे प्रोग्राम हैं जिनके जरिए वर्तमान में मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, उन पर यह कैप लागू नहीं होगा।
पब्लिक हेल्थ और भविष्य की निगरानी
कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए कीमतों में यह बदलाव सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। यह कदम विशेष रूप से अत्यधिक मार्कअप की समस्या को दूर करने के लिए उठाया गया है। अस्पताल बिलिंग प्रथाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान भी इस मुद्दे को पहले उठाया गया था।
The Economic Times के शोध के अनुसार, निर्माताओं को इन सीमाओं का पालन करना होगा, लेकिन उन्हें उत्पादन स्तर भी बनाए रखना होगा ताकि बाजार में दवाओं की कमी न हो। मरीज अपनी दवाओं की सही कीमत जानने के लिए 9 नवंबर के बाद Pharma Sahi Daam मोबाइल ऐप या NPPA की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।
The Hindu Business Line की रिपोर्ट के अनुसार, नियामक अधिकारियों ने कहा है कि बाजार की जरूरतों के हिसाब से इस सूची को समय-समय पर अपडेट किया जाएगा। निजी स्वास्थ्य केंद्रों में इन मूल्य नियंत्रणों के प्रभाव का पता भविष्य के प्रवर्तन से चलेगा।
अधिकारी इस बात पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं कि मरीजों से ज्यादा वसूली न की जाए। Drugs Prices Control Order 2013 के तहत नियमों का पालन न करने वाली संस्थाओं से ब्याज सहित अतिरिक्त राशि वसूल की जा सकती है। अगले महीने से नए मूल्य लागू होने पर मरीजों के मेडिकल बिलों में यह बदलाव नजर आएगा।









