भारत में लाखों कैंसर मरीजों के लिए इलाज का खर्च अब काफी कम हो जाएगा। 9 नवंबर 2026 से कैंसर के इलाज की लागत में 70 प्रतिशत तक की कमी आने की उम्मीद है। यह बड़ी राहत नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के एक नए निर्देश के बाद मिलेगी।
रेगुलेटर ने 137 गैर-अनुसूचित एंटी-कैंसर दवाओं के लिए ट्रेड मार्जिन को अधिकतम 30 प्रतिशत तक सीमित करने का आदेश दिया है। इस संबंध में NPPA ने 17 अक्टूबर 2026 को एक गजट नोटिफिकेशन जारी किया है। यह कदम दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया है।
यह नई पॉलिसी साल 2019 में शुरू किए गए एक पायलट प्रोजेक्ट पर आधारित है। उस प्रोजेक्ट के जरिए 42 कैंसर दवाओं की कीमतों को सफलतापूर्वक कम किया गया था। अधिकारियों का मुख्य उद्देश्य उन अत्यधिक मार्क-अप को रोकना है, जिनकी वजह से परिवारों के लिए जीवन रक्षक थेरेपी की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ गई थीं।
कैंसर दवाओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी का कारण
देश में कैंसर वर्तमान में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के अनुमानों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 15 लाख नए मामले सामने आते हैं। ऐसे में मरीजों को इलाज के लिए भारी रकम खर्च करनी पड़ती है।
मरीजों को अक्सर उन्नत टारगेटेड थेरेपी या इम्यूनोथेरेपी के लिए अपनी जेब से बहुत अधिक पैसा खर्च करना पड़ता है। समस्या यह है कि ये दवाएं नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स में शामिल नहीं होती हैं। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी के विश्लेषण में पाया गया कि औसत ट्रेड मार्क-अप लगभग 170 प्रतिशत था। कुछ मामलों में तो यह मार्क-अप 700 प्रतिशत से भी अधिक पाया गया।
कीमत नियंत्रण आदेश के तहत नए नियम
कीमतों को नियंत्रित करने के लिए यह आदेश ड्रग्स प्राइसेस कंट्रोल ऑर्डर 2013 के पैराग्राफ 19 का उपयोग करता है। इसके तहत ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाया गया है। अब मार्जिन को अधिकतम रिटेल प्राइस (MRP) के 30 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया है, जिसमें जीएसटी शामिल नहीं है।
व्यावहारिक रूप से देखें तो यह स्टॉकिस्ट और वितरकों से ली जाने वाली कीमत पर लगभग 42.86 प्रतिशत का मार्क-अप होगा। नोटिफिकेशन की तारीख से सात दिनों के भीतर निर्माताओं को संशोधित अधिकतम रिटेल प्राइस का डेटा राष्ट्रीय प्राधिकरण और राज्य ड्रग कंट्रोलरों को सौंपना होगा।
यह नियम उन 137 दवाओं पर लागू होगा जिन्हें स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशालय के तहत गठित एक विशेषज्ञ समिति ने सुझाया है। इस समिति में सरकारी अधिकारियों के साथ-साथ स्वास्थ्य विशेषज्ञों और ऑन्कोलॉजिस्ट शामिल थे। यह नियम पेटेंट और गैर-पेटेंट दोनों तरह की दवाओं पर लागू होगा, जिनमें 20 से अधिक प्रकार के कैंसर का इलाज शामिल है।
- Pembrolizumab
- Nivolumab
- Osimertinib
- Durvalumab
- Bevacizumab
- Denosumab
- Pegfilgrastim
- Palbociclib
- Ribociclib
ध्यान देने वाली बात यह है कि पेशेंट असिस्टेंस प्रोग्राम के तहत दी जाने वाली दवाओं की मात्रा को इन नए मार्जिन कैप से बाहर रखा गया है।
मरीजों और बाजार पर पड़ने वाला असर
सरकारी अनुमानों के मुताबिक, इस कदम से मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होगी। भारत में एंटी-कैंसर दवाओं का कुल बाजार लगभग 12,500 करोड़ रुपये का है। यह आदेश इस बाजार के एक बड़े गैर-अनुसूचित हिस्से को कवर करता है।
उपभोक्ताओं के बिल कम होंगे, लेकिन सटीक कटौती इस बात पर निर्भर करेगी कि जिस ब्रांड की दवा वे खरीद रहे हैं, उसका वर्तमान मार्जिन कितना है। अस्पतालों और रिटेलर्स को 9 नवंबर से नई दरों को लागू करना होगा और अपडेटेड प्राइस लिस्ट दिखानी होगी।
इंडस्ट्री विश्लेषण के अनुसार, उन रिटेलर्स, अस्पतालों और स्टॉकिस्टों की कमाई कम हो सकती है जो पहले बहुत अधिक मार्जिन पर काम कर रहे थे। वहीं निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्पादन का स्तर बना रहे ताकि दवाओं की कमी न हो। राज्य ड्रग कंट्रोलर इस बात की निगरानी करेंगे कि कम कीमतें वास्तव में मरीजों तक पहुंचें।
मरीज वर्तमान कीमतों की जांच के लिए फार्मा सही दाम (Pharma Sahi Daam) ऐप या नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी की आधिकारिक वेबसाइट का उपयोग कर सकते हैं। 2019 के पायलट प्रोजेक्ट ने यह साबित किया था कि सप्लाई चेन को प्रभावित किए बिना मार्जिन कैप से लागत कम की जा सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि यह कदम राहत देने वाला है, लेकिन कुछ पेटेंट दवाएं बायोसिमिलर्स की तुलना में महंगी बनी रह सकती हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए इस आदेश के कार्यान्वयन की निगरानी करना अब प्राथमिकता है। मरीजों को सलाह दी गई है कि वे अपने इनवॉइस संभाल कर रखें और ज्यादा पैसे लिए जाने पर अधिकारियों को शिकायत करें।

























