अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी किया है जिसके तहत उन्होंने भारत सहित रूसी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के शीर्ष पांच आयातकों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी को वापस ले लिया है। यह अस्थायी राहत 16 अक्टूबर 2026 की तारीख से लागू की गई है।
इस आदेश की वजह से उन नए शुल्कों को तुरंत लागू होने से रोक दिया गया है, जो 18 अक्टूबर 2026 से व्यापार पर असर डालने वाले थे। व्हाइट हाउस ने इस फैसले की पुष्टि एक कार्यकारी आदेश के जरिए की है।
यह कदम Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 की धारा 115 का हवाला देते हुए उठाया गया है। इस कानून पर 18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर किए गए थे, जो राष्ट्रपति को रूसी ऊर्जा के पांच सबसे बड़े आयातकों पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त एड वैलोरम ड्यूटी लगाने का अधिकार देता था यदि वे अक्टूबर की समय सीमा के बाद नई खरीदारी करते।
ट्रंप प्रशासन की छूट और शर्तें
राष्ट्रपति ट्रंप ने इस आदेश के तहत ग्रैहम एक्ट की धारा 112 और 113 में दिए गए प्रतिबंधों और शुल्कों के साथ-साथ धारा 102 की विशिष्ट पाबंदियों से भी छूट दे दी है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यह छूट संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के लिए जरूरी है, जैसा कि कांग्रेस को सौंपे गए आधिकारिक प्रमाणन में कहा गया है।
हालांकि यह छूट फिलहाल खुली रखी गई है, लेकिन व्हाइट हाउस ने ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव को रूसी ऊर्जा खरीद की निगरानी करने का निर्देश दिया है। उन्हें किसी भी ऐसे सबूत की रिपोर्ट करनी होगी जिससे पता चले कि प्रतिबंधों से बचने की कोशिश की जा रही है, ताकि भविष्य में जरूरी कार्रवाई की जा सके।
इस फैसले पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं। कई डेमोक्रेट्स और यूक्रेन के समर्थकों ने चिंता जताई है कि इस कदम से रूस पर यूक्रेन युद्ध को लेकर दबाव बनाने की वह ताकत कम हो जाएगी, जो कांग्रेस ने मूल रूप से सोची थी।
ऊर्जा बाजार और भारत की स्थिति
प्रशासन के तर्क के अनुसार, यह निर्णय अमेरिकी उपभोक्ताओं को ऊर्जा की ऊंची कीमतों से बचाने के लिए एक व्यावहारिक कदम है। हाल ही में कच्चे तेल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रही है। राष्ट्रपति ट्रंप ने बाजारों को स्थिर करने के लिए रूस से बड़ी मात्रा में डीजल लेने के सौदे की ओर इशारा किया है।
ऊर्जा परिदृश्य में भारत एक प्रमुख खिलाड़ी बना हुआ है और वर्तमान में वह रूसी समुद्री कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है। Kpler सहित अन्य आउटलेट्स द्वारा बताए गए शिप ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, भारत ने सितंबर 2026 में लगभग 1.82 मिलियन बैरल प्रति दिन तेल आयात किया।
यह आंकड़ा जून में दर्ज किए गए 2.6 मिलियन बैरल प्रति दिन के उच्चतम स्तर से कम है। इसके बावजूद, भारत इस मामले में चीन से आगे है, जिसने उसी महीने लगभग 1.49 मिलियन बैरल प्रति दिन का आयात किया था।
राजनयिक चर्चा और भविष्य के प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि इस राहत से चल रही राजनयिक चर्चाओं के लिए जरूरी समय और जगह मिल गई है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव ने चेतावनी दी कि यह छूट कोई स्थायी निश्चितता नहीं देती है। उन्होंने सलाह दी कि भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए और वाशिंगटन से दोबारा आने वाले संभावित दबाव के लिए तैयार रहना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि इस अस्थायी राहत को स्थायी व्यापार रियायतों के आधार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस छूट का समय अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भारत यात्रा के साथ मेल खाता है, जो 17 अक्टूबर 2026 को शुरू हुई। आधिकारिक कार्यक्रमों के अनुसार, सचिव रुबियो मुंबई में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बातचीत करेंगे और रिलायंस जामनगर रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स का दौरा करेंगे।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने संकेत दिया है कि जामनगर के दौरे के दौरान ऊर्जा सहयोग पर चर्चा करने के लिए रिलायंस के प्रतिनिधियों के साथ बैठकें होंगी। बिजनेस स्टैंडर्ड द्वारा उद्धृत विश्लेषकों के अनुसार, अब रिफाइनर वर्तमान स्तर पर रूसी कच्चे तेल की खरीदारी जारी रखने की उम्मीद कर रहे हैं।
तत्काल टैरिफ के खतरे के हटने से नई दिल्ली को अपनी ऊर्जा आयात रणनीति बनाए रखने का मौका मिला है, जबकि व्यापार वार्ताएं जारी हैं। हालांकि, वाशिंगटन किसी भी समय इस छूट को रद्द करने की क्षमता रखता है, जिसका अर्थ है कि आने वाले महीनों में टैरिफ अभी भी राजनयिक प्रभाव के एक उपकरण के रूप में बना रहेगा।

























