देश में बिजली की तेजी से बढ़ती खपत को पूरा करने के लिए भारत को 115 गीगावाट या उससे अधिक की अतिरिक्त कोयला आधारित बिजली क्षमता की आवश्यकता हो सकती है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के चेयरपर्सन घनश्याम प्रसाद ने 13 अक्टूबर, 2026 को इस संभावित वृद्धि की पुष्टि की।
उन्होंने बताया कि क्षमता विस्तार के जो लक्ष्य पहले तय किए गए थे, वे अब पर्याप्त नहीं रह गए हैं। घनश्याम प्रसाद ने इस सप्ताह आयोजित इंडिया एनर्जी समिट के दौरान बिजली की इन बदलती जरूरतों के बारे में विस्तार से बात की।
वर्तमान आकलन यह संकेत देते हैं कि थर्मल क्षमता में 105 गीगावाट जोड़ने की पिछली योजना को अब और बढ़ाना होगा। ऐसा कदम नेशनल ग्रिड को स्थिर बनाए रखने के लिए जरूरी माना जा रहा है।
बिजली की मांग में भारी बढ़ोतरी के कारण
पूरे 2026 के दौरान बिजली की मांग में साल-दर-साल 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में दैनिक मांग पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 45 से 50 गीगावाट अधिक है।
हाल ही में पीक डिमांड 271 गीगावाट तक पहुंच गई थी। बिजली की खपत में इस तेज उछाल के पीछे मौसम के असामान्य पैटर्न और हाइड्रोपावर जनरेशन में 20 प्रतिशत की बड़ी गिरावट मुख्य कारण रहे हैं।
इन तथ्यों का जिक्र रॉयटर्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, फाइनेंशियल एक्सप्रेस और हिंदू बिजनेसलाइन की विभिन्न रिपोर्टों में किया गया है। भारत वर्तमान में लगभग 252.5 गीगावाट थर्मल पावर पर निर्भर है, जो कुल स्थापित क्षमता का 45 प्रतिशत हिस्सा है।
कोयले से बिजली बनाने की क्षमता में केवल सितंबर महीने में 13.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह कदम उन गंभीर कमियों को दूर करने के लिए उठाया गया, जो 2023 के बाद सबसे अधिक देखी गई थीं।
भविष्य की क्षमता और सरकारी नीतियां
देश में रिन्यूएबल एनर्जी यानी अक्षय ऊर्जा का विस्तार सालाना 50 गीगावाट से अधिक की स्थिर गति से जारी है। इसके बावजूद अधिकारियों का तर्क है कि औद्योगिक और घरेलू बिजली की कमी को रोकने के लिए एक संतुलित एनर्जी मिक्स का होना बहुत जरूरी है।
पुरानी दीर्घकालिक रणनीति के तहत 2023 के आधार से 2035 तक थर्मल क्षमता को बढ़ाकर लगभग 307 गीगावाट करने का लक्ष्य रखा गया था। अब सरकार के भीतर आंतरिक चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि कोयला आधारित प्रोजेक्ट्स की मंजूरी और उन्हें पूरा करने की प्रक्रिया में तेजी कैसे लाई जाए।
इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। जहां कुछ हितधारक दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्यों पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जता रहे हैं, वहीं अन्य का मानना है कि राष्ट्रीय आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए भरोसेमंद बेसलोड पावर अनिवार्य है।
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी फिलहाल इन कमियों को दूर करने के लिए अपनी क्षमता के अनुमानों को संशोधित कर रही है। आने वाले समय में नीतिगत प्रतिक्रियाओं में शामिल हो सकते हैं:
- कोयले की आपूर्ति के संबंध में नए निर्देश जारी करना।
- विशिष्ट थर्मल पावर प्रोजेक्ट्स के काम में तेजी लाना।
आपूर्ति की शेष कमी को पूरा करने में न्यूक्लियर एनर्जी और स्टोरेज सॉल्यूशंस की क्या भूमिका होगी, इस पर आगे और स्पष्टता आने की उम्मीद है।









