भारत ने जुलाई और अगस्त 2026 के दौरान लगभग 1.835 अरब यूनिट अक्षय बिजली को इस्तेमाल नहीं किया और उसे बर्बाद कर दिया। यह नुकसान ऐसे समय पर हुआ जब देश में बिजली की भारी कमी थी और रिकॉर्ड मांग के बीच कोयले का स्टॉक बहुत कम हो गया था।
Centre for Research on Energy and Clean Air द्वारा 12 अक्टूबर 2026 को जारी किए गए आंकड़ों में यह जानकारी दी गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार, बिजली की कमी के बावजूद अक्षय ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा ग्रिड में शामिल नहीं हो पाया।
Centre for Research on Energy and Clean Air के विश्लेषण के मुताबिक, इस बर्बाद हुई बिजली में 1,462 मिलियन यूनिट सौर ऊर्जा और 373 मिलियन यूनिट पवन ऊर्जा शामिल थी। यह कुल मात्रा उन दो महीनों के दौरान रिकॉर्ड की गई कुल सौर उत्पादन के लगभग 4.2 प्रतिशत के बराबर है।
तकनीकी खामियां और ग्रिड की चुनौतियां
ऊर्जा की इस बर्बादी के पीछे मुख्य कारण तकनीकी बाधाएं बताई गई हैं। रिसर्च ग्रुप ने बताया है कि ट्रांसमिशन की रुकावटें और परिचालन संबंधी समस्याएं इस नुकसान की बड़ी वजह बनी हैं।
विशेष रूप से, जब सौर ऊर्जा का उत्पादन अपने दैनिक शिखर पर होता है, तब कोयला संयंत्र अपनी बिजली उत्पादन क्षमता को उतनी तेजी से कम नहीं कर पाते। इसी तालमेल की कमी के कारण अक्षय ऊर्जा को ग्रिड से बाहर रखना पड़ा।
सरकारी आंकड़ों ने पहले भी संकेत दिया था कि अप्रैल और जून के बीच कुल सौर उत्पादन का 14 प्रतिशत हिस्सा रोक लिया गया था। जुलाई 2026 में बिजली की अधिकतम मांग 270 गीगावाट तक पहुंच गई थी, जो पिछले साल की तुलना में 18 प्रतिशत अधिक थी।
Reuters की रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि कई बिजली संयंत्रों में कोयले का भंडार काफी कम हो गया था। अक्टूबर की शुरुआत तक देश के लगभग आधे कोयला संयंत्रों के पास केवल चार दिनों की जरूरत के लिए कोयला बचा था।
अक्षय ऊर्जा क्षमता और भविष्य के लक्ष्य
भारत के पास वर्तमान में बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को छोड़कर लगभग 243 गीगावाट की स्थापित अक्षय ऊर्जा क्षमता है। कुल उत्पादन क्षमता में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग एक तिहाई है।
Centre for Research on Energy and Clean Air द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, उस तिमाही में सौर उत्पादन में साल-दर-साल 39 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। भारत का राष्ट्रीय लक्ष्य 2030 तक 500 गीगावाट की गैर-जीवाश्म क्षमता हासिल करना है, जो आज उपलब्ध लगभग 304 गीगावाट से काफी ज्यादा है।
विशेषज्ञों ने पाया कि रिकॉर्ड अक्षय ऊर्जा उत्पादन के बावजूद, ग्रिड और परिचालन संबंधी बाधाओं के कारण बिजली की बड़ी मात्रा को रोकना पड़ा। BusinessToday और BW Businessworld जैसे कई मीडिया आउटलेट्स ने भी इन निष्कर्षों को दोहराया है।
ग्रिड सुधार और आधुनिक बनाने की योजना
Ministry of Power, Central Electricity Authority और Grid Controller of India जैसे हितधारक अब अल्पकालिक विश्वसनीयता और दीर्घकालिक जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बनाने पर ध्यान दे रहे हैं।
इस अस्थिरता को प्रबंधित करने के लिए निम्नलिखित रणनीतियों का प्रस्ताव दिया गया है:
- ट्रांसमिशन क्षमता सुधारने के लिए Green Energy Corridors में निवेश को तेज करना।
- बैटरी और पंप्ड हाइड्रो प्रोजेक्ट्स जैसे ऊर्जा भंडारण समाधानों को लागू करना।
- कोयला बिजली संयंत्रों के लिए अधिक लचीले परिचालन पैटर्न विकसित करना।
- अक्षय ऊर्जा के लिए बेहतर पूर्वानुमान और शेड्यूलिंग सिस्टम लागू करना।
अधिकारियों को उम्मीद है कि कमी को दूर करने के लिए Green Energy Corridor Phase III प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जाएगा और स्टोरेज के लिए नए टेंडर निकाले जाएंगे। भविष्य के ऊर्जा मिश्रण पर चर्चा में विशिष्ट योजना परिदृश्यों के तहत 2035 तक कोयला क्षमता वृद्धि को 105 से 150 गीगावाट के बीच संशोधित किया जा सकता है।
जैसे-जैसे ग्रिड स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ रहा है, सरकार के लिए कोयले के स्टॉक की निरंतर निगरानी और शाम के समय बिजली की कमी को रोकना प्राथमिकता बनी रहेगी।









