सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को एक विशेष सुनवाई की। इस दौरान अदालत ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिए कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों को हिरासत में न लिया जाए। यह आदेश तब आया जब नई दिल्ली में एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने हजारों लोगों को हिरासत में ले लिया था।
यह पूरा मामला युवाओं के नेतृत्व वाले एक आंदोलन से जुड़ा है। इस प्रदर्शन के कारण मध्य दिल्ली को सुरक्षा के लिहाज से एक किले में तब्दील कर दिया गया था। प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे थे।
इस आंदोलन की जड़ें मई 2026 में बनी कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़ी हैं, जिसकी स्थापना अभिजीत डिपके ने की थी। यह पार्टी एक व्यंग्यात्मक ताकत के रूप में उभरी। इसकी शुरुआत तब हुई जब भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी में बेरोजगार युवाओं की तुलना कॉकरोच से की गई थी।
कॉकरोच जनता पार्टी और राजनीतिक विरोध
कॉकरोच जनता पार्टी ने इससे पहले भी अपनी ताकत दिखाई थी। अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ चलाए गए अभियानों के बाद इस समूह ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया था।
अब यह संगठन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाना बना रहा है। संगठन का दावा है कि भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान अनियमितताएं हुई हैं। इस मुद्दे को लेकर कई विपक्षी दल भी उनके साथ जुड़ गए हैं।
आंदोलन में कांग्रेस, टीएमसी, आप और लेफ्ट जैसे विपक्षी दल शामिल हैं। ये पार्टियां इस संकट को चुनावी अखंडता के लिए एक बड़े जोखिम के रूप में पेश कर रही हैं।
पुलिस की कार्रवाई और हिरासत में लिए गए नेता
दिल्ली पुलिस ने अपने बयानों में पुष्टि की है कि 9 अक्टूबर को फ्लाइट से उतरते ही अभिजीत डिपके, सौरव दास और आशुतोष रंका समेत कई नेताओं को हिरासत में लिया गया था। पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन प्रदर्शनों से जुड़ी 20 से अधिक एफआईआर दर्ज की गई हैं।
इन एफआईआर में पुलिस कर्मियों पर हमला करने और रास्ते में बाधा डालने जैसे आरोप लगाए गए हैं। द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस जैसे मीडिया आउटलेट्स द्वारा सत्यापित अनुमानों के मुताबिक, पुलिस ने प्रदर्शनों के दौरान 3,000 से 7,000 लोगों को हिरासत में लिया।
हिरासत में लिए गए लोगों में कई बड़े नाम शामिल थे। इनमें पूर्व मुख्यमंत्रियों ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और पिनाराई विजयन जैसे प्रमुख नेता शामिल थे। शहर की सुरक्षा के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया था, जिसकी संख्या 23,000 से 41,000 कर्मियों के बीच बताई गई है।
बाद में 11 अक्टूबर को कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने प्रदर्शनकारी नेताओं की रिहाई का आदेश दिया। यह रिहाई 50,000 रुपये के बॉन्ड और इस शर्त पर हुई कि वे एक साल तक शांति भंग नहीं करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और भविष्य की दिशा
जस्टिस जॉयमल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने निर्देश दिया कि अधिकारियों को अवैध हिरासत बंद करनी होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 द्वारा प्रतिबंधित क्षेत्रों के बाहर शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों को नहीं रोका जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि मेट्रो, रेल और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए, बशर्ते कानून व्यवस्था की आवश्यकता न हो। कोर्ट ने इस मामले में आधिकारिक जवाब मांगे हैं, जिनके नोटिस जारी किए जा चुके हैं और जवाब 13 अक्टूबर के आसपास आने की उम्मीद है।
हालांकि न्यायिक आदेश से प्रदर्शनकारियों को अस्थायी राहत मिली है, लेकिन मतदाता सूची का विवाद अभी भी अनसुलझा है। कॉकरोच जनता पार्टी ने कसम खाई है कि वह अपनी गतिविधियां जारी रखेगी।
- पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे तक प्रदर्शन करेगी।
- आंदोलन को देशव्यापी स्तर पर ले जाने की योजना है।
इंडिया गठबंधन के विपक्षी दल भी अब आगे की रणनीति बना रहे हैं। वे अपनी शिकायतों को दूर करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ संभावित बैठकें करने की तैयारी कर रहे हैं।









