बाराबंकी के रामनगर नगर पंचायत में पुरानी तहसील परिसर में आयोजित एक राम कथा सत्र के दौरान कथावाचक अतुल कृष्ण भारद्वाज ने ‘श्री राम वनवास’ प्रसंग का भावुक वर्णन किया। जब भारद्वाज ने बताया कि कैसे भगवान राम ने अपने पिता के वचन और कुल की मर्यादा को बनाए रखने के लिए अपना राज्य छोड़कर वन की ओर प्रस्थान किया, तो वहां मौजूद श्रद्धालु भावुक हो गए।
भारद्वाज ने इस बात पर जोर दिया कि भगवान राम ने अपने स्वयं के सुख की परवाह किए बिना परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए त्याग का संदेश दिया। उन्होंने उस प्रसंग का जिक्र किया जहां राजा दशरथ ने दर्पण में अपना ढलता चेहरा देखकर भक्ति में मन लगाने के लिए अपना राज्य भगवान राम को सौंपने का निर्णय लिया। इसके जरिए उन्होंने बुजुर्गों को समय रहते अपनी जिम्मेदारियां उत्तराधिकारियों को सौंपने और आध्यात्मिक स्मरण की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
जीवन के मूल्यों और कर्तव्यों की सीख
उन्होंने शुभ कार्यों में देरी न करने की सलाह देते हुए बताया कि जब राजा दशरथ ने अयोध्या के नागरिकों के सामने भगवान राम के राज्याभिषेक का प्रस्ताव रखा लेकिन समारोह को अगले दिन के लिए टाल दिया, तो परिणाम दुखद रहा। उन्होंने कहा कि इंसान को भगवान राम से सीखना चाहिए कि हर परिस्थिति में प्रसन्न कैसे रहा जाए।
माता कौशल्या की भूमिका पर चर्चा करते हुए भारद्वाज ने कहा कि भगवान राम के वनवास के बावजूद उन्होंने किसी को दोष नहीं दिया और अपने पति के वचन को प्राथमिकता दी। लक्ष्मण की भक्ति का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि एक भाई को लक्ष्मण जैसा होना चाहिए। जब उन्होंने भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के वन प्रस्थान का वर्णन किया, तो श्रोता अपनी आंखों के आंसू नहीं रोक पाए।
- भारद्वाज ने कहा कि माता कैकेयी राम कथा में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं, क्योंकि उनके कार्यों से ही भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम बने और राम राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- माता सीता ने पत्नी के कर्तव्यों के लिए अयोध्या के सुखों का त्याग किया, जबकि लक्ष्मण ने अपने भाई की सेवा में 14 वर्ष वन में बिताए।
उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि भगवान राम के वनवास का प्रसंग हर किसी के लिए अपने कर्तव्य और धर्म को निभाने की प्रेरणा है। इस कार्यक्रम में व्यापार मंडल अध्यक्ष रविकांत पांडेय, पवन ओझा और गौरीकांत दीक्षित सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।









