INDIA गठबंधन के नेताओं ने 12 अक्टूबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक संयुक्त रिट याचिका दायर की है। इस याचिका के जरिए भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) द्वारा चलाए जा रहे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) को चुनौती दी गई है।
विपक्ष ने इस कानूनी कार्रवाई के माध्यम से मांग की है कि पूरे देश में चल रहे इस रिवीजन कार्य को तुरंत रोका जाए। साथ ही, याचिका में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों की स्वतंत्र जांच और ऑडिट की मांग की गई है।
राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं के एक समूह ने यह याचिका दायर करने के लिए मध्य दिल्ली में मार्च किया। इस याचिका को डायरी नंबर 64196/2026 के तहत दर्ज किया गया है।
याचिका में शामिल प्रमुख नेता और कानूनी आधार
इस याचिका पर राहुल गांधी के अलावा कई अन्य बड़े नेताओं ने हस्ताक्षर किए हैं। इनमें कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे, टीएमसी के सौगता रॉय, सपा के अखिलेश यादव और राजद के तेजस्वी यादव शामिल हैं।
इनके अलावा शिवसेना यूबीटी के संजय राउत, सीपीआई(एम) के एम.ए. बेबी, सीपीआई के डी. राजा, जेएमएम की महुआ माझी, एनसीपी-एसपी की सुप्रिया सुले और आईयूएमएल के ई.टी. मोहम्मद बशीर ने भी इस याचिका का समर्थन किया है।
इस याचिका में भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 324 का हवाला दिया गया है।
विपक्ष ने अदालत से अनुरोध किया है कि सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जाए। यह कमेटी रिवीजन के दौरान डिजिटल डेटाबेस तक पहुंच और उसमें किए गए बदलावों की जांच करे।
मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया और आंकड़े
निर्वाचन आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 के तहत साल 2025 में घर-घर जाकर सत्यापन का यह अभियान शुरू किया था। आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित, डुप्लीकेट या लापता मतदाताओं के नाम हटाकर वोटर लिस्ट को शुद्ध करना है।
इससे पहले 27 मई, 2026 को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में इस प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था।
जून 2025 से अलग-अलग चरणों में जारी की गई ड्राफ्ट लिस्ट के अनुसार, करीब 95.40 करोड़ रिकॉर्ड्स की जांच की गई है। इसमें से लगभग 13.39 करोड़ प्रविष्टियों को ‘अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट’ की श्रेणी में रखा गया है।
राजनीतिक दलों के साथ साझा किए गए आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, इस संख्या का विवरण इस प्रकार है:
- मृत मतदाताओं की संख्या: 2.8 करोड़
- स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाता: 6.3 करोड़
- डुप्लीकेट प्रविष्टियां: 1 करोड़
आयोग के अधिकारियों का कहना है कि ये आंकड़े केवल ड्राफ्ट स्टेज के वर्गीकरण हैं, न कि अंतिम रूप से हटाए गए नाम।
डिजिटल सिस्टम पर चिंता और कानूनी अड़चनें
विपक्ष ने इस बात पर चिंता जताई है कि गलत तरीके से हटाए गए नामों को वापस जोड़ने की प्रक्रिया आसान नहीं है। उन्हें ECINET और ERONET जैसे केंद्रीकृत डिजिटल सिस्टम के प्रभाव को लेकर भी डर है।
याचिका में विशेष रूप से मांग की गई है कि बूथ-वार हटाए गए नामों की सूची कारणों और जनसांख्यिकीय विवरण के साथ प्रकाशित की जाए। साथ ही, आयोग की पूरी फाइलें, मीटिंग के मिनट्स और डिजिटल सिस्टम के एक्सेस लॉग्स पेश करने की मांग की गई है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पहले शक्तियों के पृथक्करण और लंबित मुकदमों का हवाला देते हुए इन चिंताओं पर विपक्षी नेताओं से निजी मुलाकात करने से इनकार कर दिया था।
12 अक्टूबर को कोर्ट तक जाने वाले मार्च को दिल्ली पुलिस ने मैनेज किया। पुलिस ने 11 अक्टूबर को जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित नहीं करने का फैसला किया था। अब अधिकारियों ने ऐसे प्रदर्शनों के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को अनुमति प्राप्त स्थान घोषित किया है।
सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने 12 अक्टूबर की शाम तक याचिका में 14 कमियां (defects) बताई हैं। इनमें ऑथराइजेशन की कमी, दस्तावेजों की समस्या और कोर्ट फीस में 200 रुपये की कमी शामिल है।
फिलहाल यह मामला लिस्टिंग के लिए लंबित है। सुनवाई शुरू होने के बाद उम्मीद है कि निर्वाचन आयोग इन दावों पर अपना औपचारिक जवाब पेश करेगा। यह तय करेगा कि बाकी राज्यों में यह रिवीजन जारी रहेगा या इस पर रोक लगेगी, जिससे आगामी चुनावों की तैयारी पर बड़ा असर पड़ेगा।









