Commission for Air Quality Management द्वारा नियुक्त 15 सदस्यों के एक एक्सपर्ट पैनल ने एक नया रोडमैप तैयार किया है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, साल 2030 तक दिल्ली NCR में बिकने वाली सभी नई प्राइवेट फोर व्हीलर्स का इलेक्ट्रिक होना जरूरी होगा।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य सर्दियों में होने वाले गंभीर वायु प्रदूषण के संकट से निपटना है। पैनल का मानना है कि वाहनों से निकलने वाला धुआं क्षेत्र में PM2.5 स्तर को बढ़ाने में 20 प्रतिशत से 41 प्रतिशत तक का योगदान देता है।
इस एक्सपर्ट कमेटी की अध्यक्षता IIT Madras के Ashok Jhunjhunwala कर रहे हैं, जबकि AIIMS के पूर्व डायरेक्टर Randeep Guleria इसके को-चेयर हैं। कमेटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट 18 अगस्त, 2026 को जमा की है, जिसमें टेलपाइप उत्सर्जन को पूरी तरह खत्म करने का रास्ता बताया गया है।
नई कारों की बिक्री के लिए तय किया गया लक्ष्य
इस कमेटी में IIT Delhi, IIT Kanpur, NITI Aayog और Ministry of Heavy Industries जैसे संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल हैं। पैनल ने नई प्राइवेट फोर व्हीलर्स की बिक्री के लिए एक चरणबद्ध समय-सीमा तय की है।
नियमों के अनुसार, वाहन निर्माताओं (OEMs) को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी कुल बिक्री में जीरो टेलपाइप उत्सर्जन वाले वाहनों की हिस्सेदारी साल 2027 तक 20 प्रतिशत हो। इसके बाद 2028 तक इसे 45 प्रतिशत और 2029 तक 70 प्रतिशत तक ले जाना होगा।
साल 2030 तक यह लक्ष्य 100 प्रतिशत करना होगा। Business Standard, Mint और Hindustan Times की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 जनवरी, 2031 से दिल्ली NCR में किसी भी नए इंटरनल कम्बशन इंजन (ICE) वाले प्राइवेट फोर व्हीलर का रजिस्ट्रेशन नहीं किया जाएगा।
पुराने और प्रदूषित वाहनों को हटाने की योजना
सड़कों से प्रदूषण कम करने के लिए कमेटी ने पुराने और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को तुरंत हटाने का प्रस्ताव दिया है। BS I, BS II और BS III श्रेणी के वाहनों को तुरंत सड़कों से हटाना होगा।
BS IV श्रेणी के वाहनों के लिए साल 2030 तक का समय तय किया गया है, जिसके बाद उन्हें हटा दिया जाएगा। इसके अलावा, BS VI टू व्हीलर्स को 2035 तक और BS VI कारों को 2040 तक चरणबद्ध तरीके से बाहर करने की सिफारिश की गई है।
कमेटी के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली NCR में कुल सक्रिय और फिटनेस अप्रूव्ड वाहनों की संख्या लगभग 2.21 करोड़ है। इनमें BS I से BS III तक के वाहन करीब 30 प्रतिशत हैं, लेकिन ARAI के उत्सर्जन कारकों के अनुसार, कुल पार्टिकुलेट मैटर उत्सर्जन में इनका हिस्सा लगभग 74 प्रतिशत है।
दूसरी तरफ, BS VI वाहन कुल वाहनों का 41 प्रतिशत से अधिक हैं, लेकिन कुल उत्सर्जन में इनका योगदान केवल 7 प्रतिशत के करीब है। वर्तमान में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या केवल 3.6 लाख है, जो कुल बेड़े का मात्र 1.6 प्रतिशत है।
इलेक्ट्रिक वाहनों की स्थिति और नई शर्तें
वित्तीय वर्ष 2026 में दिल्ली में 8.5 लाख नए वाहनों का रजिस्ट्रेशन हुआ, जिनमें इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 12.65 प्रतिशत रही। साल 2026 के अब तक के आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में इलेक्ट्रिक वाहनों का शेयर बढ़कर लगभग 13.5 प्रतिशत हो गया है।
बिक्री लक्ष्यों के अलावा, रिपोर्ट में कुछ तकनीकी और नीतिगत बदलावों का सुझाव दिया गया है। वाहनों के केबिन में आने वाली हवा के लिए PM2.5 और VOC फिल्ट्रेशन अनिवार्य करने का प्रस्ताव है, हालांकि इसकी कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है।
उत्सर्जन की रिमोट सेंसिंग की प्रक्रिया 1 अप्रैल, 2028 से अनिवार्य कर दी जाएगी। इसके साथ ही, वाहन श्रेणी के आधार पर 20,000 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के खरीद और स्क्रैपेज इंसेंटिव देने का सुझाव दिया गया है, साथ ही रेट्रोफिटिंग के लिए भी सहायता देने की बात कही गई है।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए रणनीतिक बदलाव
इन नए नियमों को दिल्ली की मौजूदा EV पॉलिसी के साथ जोड़ा गया है। वर्तमान पॉलिसी के तहत जनवरी 2027 से इंटरनल कम्बशन इंजन वाले थ्री व्हीलर्स और अप्रैल 2028 से टू व्हीलर्स का रजिस्ट्रेशन बंद हो जाएगा।
TERI के विश्लेषकों ने बताया है कि इस क्षेत्र में पहले CNG की ओर बदलाव के दौरान विरोध हुआ था, लेकिन रेगुलेटरी दबाव के कारण वह अंततः सफल रहा। कमेटी ने अपनी कार्यकारी सारांश में कहा है कि प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए आक्रामक समय-सीमा की सिफारिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
हालांकि, इसे लागू करना एक जटिल काम है क्योंकि इसमें कई बाधाएं हैं। इसकी सफलता चार्जिंग स्टेशनों के विस्तार, पावर ग्रिड की क्षमता बढ़ाने और मास सेगमेंट में सस्ते इलेक्ट्रिक मॉडल के आने पर निर्भर करेगी।
अधिकारी अब इस बात पर विचार कर रहे हैं कि इन सिफारिशों को बाध्यकारी आदेश के रूप में अधिसूचित किया जाए या केवल सलाहकार दिशा-निर्देशों के रूप में रखा जाए। फिलहाल सर्दियों के लिए GRAP उपाय स्वतंत्र रूप से जारी रहेंगे। अंतिम निर्णय लेने से पहले अधिकारी वाहन निर्माताओं और राज्य सरकारों के साथ चर्चा करेंगे।









