कांग्रेस नेता कुंवर दानिश अली ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा की हिरासत की कड़ी निंदा की है। उन्होंने ‘सेव डेमोक्रेसी’ मार्च के दौरान पुलिस द्वारा की गई बर्बरता का आरोप लगाया है।
यह घटना 7 अक्टूबर 2026 की है, जब विपक्षी नेता निर्वाचन सदन की ओर मार्च कर रहे थे और उन्हें हिरासत में ले लिया गया। दानिश अली ने कहा कि जब तक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से नहीं हटाया जाता, उन पर मुकदमा नहीं चलता और उन्हें जेल नहीं भेजा जाता, तब तक उनकी पार्टी चुप नहीं रहेगी।
वोट चोरी और वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का आरोप
विपक्षी नेता चुनावी रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में कथित अनियमितताओं और ‘वोट चोरी’ के आरोपों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। यह विरोध प्रदर्शन 6 अक्टूबर को और तेज हो गया था।
इस दौरान दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सहित INDIA गठबंधन के 300 से अधिक सदस्यों को हिरासत में ले लिया था। विपक्ष के नेता के खिलाफ पुलिस द्वारा शारीरिक दुर्व्यवहार के आरोप सामने आए हैं।
अशोक गहलोत जैसे नेताओं ने पुष्टि की है कि हिरासत की प्रक्रिया के दौरान सांसदों के साथ शारीरिक धक्का-मुक्की की गई। दानिश अली ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार के नेतृत्व को चुनौती दी है।
प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को चेतावनी
दानिश अली ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चेतावनी देते हुए कहा कि राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ पुलिस बलों का उपयोग करना ‘आग से खेलने’ जैसा है। उन्होंने इस कार्रवाई को लोकतंत्र के खिलाफ बताया है।
इस बीच, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग करने वाली याचिकाओं की जांच की है। सुप्रीम कोर्ट ने उनके निलंबन के लिए कोई अंतरिम आदेश जारी करने से इनकार कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की चुनाव आयोग से पूछताछ
कोर्ट ने चयन समिति की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए हैं। इस समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
अदालत ने चुनाव आयोग से कुछ खास रिकॉर्ड्स की मांग की है, जिनमें शामिल हैं:
- फॉर्म 6 में किए गए बदलावों का विवरण।
- स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रियाओं से जुड़ी जानकारी।
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसदीय महाभियोग की प्रक्रिया जरूरी होती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि चुनाव आयोग के फैसले आदर्श रूप से आम सहमति या बहुमत के माध्यम से लिए जाने चाहिए।









