दिल्ली में वायु प्रदूषण के स्रोतों पर रियल टाइम नजर रखने के लिए एक विशेष प्रयोगशाला शुरू की गई है। तीन साल तक डेटा की कमी के बाद इस सुविधा को आधिकारिक तौर पर 24 अक्टूबर 2026 को खोला गया। यह लैब राजधानी की हवा को प्रभावित करने वाली गैसों और एरोसोल के रासायनिक मिश्रण का विश्लेषण करेगी।
केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने न्यू राजेंद्र नगर में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) परिसर में ‘इंटीग्रेटेड एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड एरोसोल टॉक्सिसिटी एनालिसिस लेबोरेटरी’ का उद्घाटन किया। यह पूरी परियोजना मिशन मौसम पहल के तहत संचालित है, जिसके लिए 80 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है।
इस लैब का मुख्य उद्देश्य शहर की प्रदूषण नीति को केवल एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के आंकड़ों से आगे ले जाना है। इसके जरिए सरकार अब सबूतों पर आधारित हस्तक्षेप और ठोस कदम उठा सकेगी। उद्घाटन के समय मिले तकनीकी आंकड़ों ने पार्टिकुलेट मैटर के स्रोतों का पूरा ब्योरा पेश किया है।
प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों का विश्लेषण
द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, उद्घाटन के दिन PM2.5 स्तर में लगभग 25 प्रतिशत योगदान वाहनों का था। इसके अलावा प्रदूषण बढ़ाने वाले अन्य कारकों में सेकेंडरी ऑर्गेनिक एरोसोल की हिस्सेदारी 18.4 प्रतिशत रही। सेकेंडरी इनऑर्गेनिक एरोसोल का योगदान 16.5 प्रतिशत दर्ज किया गया।
सड़क की धूल से होने वाला प्रदूषण 10.9 प्रतिशत रहा, जबकि कचरा जलाने से 5 प्रतिशत PM2.5 बढ़ा। लैब के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि शहर की हवा को खराब करने में केवल एक नहीं बल्कि कई तरह के तत्व शामिल हैं।
शहरी स्मॉग की रासायनिक जटिलता
प्रोजेक्ट डायरेक्टर सचिन घुडे ने बताया कि शहर के पार्टिकुलेट मैटर का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा प्राइमरी पार्टिकल्स से बना होता है। बाकी 60 प्रतिशत हिस्सा वायुमंडलीय रासायनिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से बनता है, जिन्हें सेकेंडरी एरोसोल कहा जाता है। इन सेकेंडरी घटकों के सटीक मूल स्रोतों का पता लगाना फिलहाल मुश्किल है।
कुल प्रदूषण भार में प्राइमरी पार्टिकल्स, सेकेंडरी इनऑर्गेनिक एरोसोल और सेकेंडरी ऑर्गेनिक एरोसोल प्रत्येक की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत है। बाकी का 10 प्रतिशत हिस्सा धातुओं और जहरीले तत्वों से मिलकर बना है।
हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा लैब के पांच दिनों के आउटपुट के विश्लेषण में पाया गया कि डेली PM2.5 अनुमानों में सेकेंडरी स्रोत 29.3 से 42.2 प्रतिशत के बीच रहे। ये आंकड़े अक्सर वाहनों के उत्सर्जन से अधिक थे, जो 19.4 से 27.6 प्रतिशत के बीच दर्ज किए गए। अधिकारियों ने माना है कि वर्तमान में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जो इन सेकेंडरी प्रदूषकों के मूल स्रोतों का अलग-अलग विवरण दे सके।
भविष्य की योजनाएं और चुनौतियां
यह प्रयोगशाला AIRWISE सिस्टम के साथ जुड़ी हुई है, जो 400 मीटर रेजोल्यूशन के साथ 72 घंटे की विंडो के लिए वायु गुणवत्ता का पूर्वानुमान देगी। हालांकि, 2021 के उत्सर्जन इन्वेंट्री पर निर्भरता के कारण इन अनुमानों में जटिलता आ रही है। इस इन्वेंट्री का पूरा अपडेट जून 2027 के लिए निर्धारित है।
कुछ विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि लैब की वर्तमान रीडिंग शहर के व्यापक निगरानी नेटवर्क की तुलना में कम दिखाई दे रही है। अब नीति निर्माताओं पर यह दबाव है कि वे तय करें कि यह डेटा ‘ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान’ के तहत लागू होने वाले नियमों को कैसे बदलेगा।
मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह लैब यह पहचानने में मदद करेगी कि किस समय कौन सी गतिविधियां वायु गुणवत्ता को खराब कर रही हैं। उन्होंने इन निष्कर्षों से निपटने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वित कार्रवाई का आग्रह किया।
- वैज्ञानिक अब वर्तमान स्रोत निर्धारण क्षमताओं को बढ़ाने के लिए IIT दिल्ली के साथ सहयोग करेंगे।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी अब रासायनिक विषाक्तता का सीधे अध्ययन कर सकेंगे।
- NCR के निवासी उम्मीद करते हैं कि सटीक डेटा आने से सामान्य प्रतिबंधों की जगह टारगेटेड कंट्रोल लागू होंगे।
सर्दियों के मौसम के करीब आने के साथ, जब पराली जलाना और तापमान इनवर्जन बढ़ जाता है, वैज्ञानिक समुदाय इन मॉनिटर्स के प्रदर्शन पर बारीकी से नजर रखेगा। इसकी भविष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार स्वतंत्र समीक्षा के लिए इस जानकारी को रियल टाइम में जारी करती है या नहीं।









