इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को एक महिला, लीलावती देवी को 25,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह आदेश इसलिए दिया गया क्योंकि पुलिस विभाग की लापरवाही की वजह से लीलावती देवी को अपनी रिहाई की तारीख के बाद भी 12 अतिरिक्त दिन जेल में बिताने पड़े थे।
यह निर्देश 26 अक्टूबर 2026 को जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की अध्यक्षता वाली बेंच द्वारा जारी किया गया। लीलावती देवी एक दहेज मृत्यु मामले में मृतक की सास के रूप में आरोपी थीं। उनकी जमानत अर्जी समय पर प्रोसेस न होने के कारण वह जेल में ही रहीं।
सरकारी वकील ने कोर्ट को बताई लापरवाही
मामले की सुनवाई के दौरान 12 अक्टूबर 2026 को असिस्टेंट गवर्नमेंट एडवोकेट ने कोर्ट को जरूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार जमानत की सुनवाई को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक निर्देश देने में विफल रही थी।
अदालत के हस्तक्षेप के बाद 24 अक्टूबर 2026 को देवरिया के पुलिस अधीक्षक (SP) अभिजित आर. शंकर बेंच के सामने पेश हुए। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया में हुई चूक और लापरवाही के कारणों को स्पष्ट किया।
लापरवाही का कारण और विभागीय चूक
एसपी अभिजित आर. शंकर ने पुष्टि की कि 29 सितंबर 2026 को एक पत्र भेजा गया था, जो 1 अक्टूबर 2026 को देवरिया के एसपी कार्यालय में प्राप्त हो गया था। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी, जिन्हें पारोकर कहा जाता है, ने इस पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं की।
संबंधित अधिकारी जरूरी निर्देश तैयार किए बिना ही छुट्टी पर चले गए, जिसकी वजह से लीलावती देवी की रिहाई में देरी हुई। जस्टिस देशवाल ने असिस्टेंट गवर्नमेंट एडवोकेट को समय पर सहायता न देने के लिए पुलिस विभाग की कड़ी आलोचना की।
कोर्ट का अंतिम आदेश और रिकवरी की प्रक्रिया
हाई कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में यह अनिवार्य किया कि पीड़ित महिला को 25,000 रुपये का मुआवजा एक महीने के भीतर दिया जाए। कोर्ट ने इस मामले में पुलिस विभाग को कुछ विशेष अधिकार भी दिए हैं:
- पुलिस विभाग इस पूरी घटना की विभागीय जांच कर सकता है।
- लापरवाही के लिए जिम्मेदार पाए गए अधिकारियों के वेतन से मुआवजे की राशि वसूली जा सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजे की रकम उन विशिष्ट अधिकारियों की सैलरी से काटी जाएगी जिन्होंने इस कार्य में लापरवाही बरती थी।









