हर पाँच साल पर बदल जाते है जाब कार्ड धारक,जिनके बल पर सरकारी धन का होता है जमकर बंदरबाट

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हर पाँच साल पर बदल जाते है जाब कार्ड धारक,जिनके बल पर सरकारी धन का होता है जमकर बंदरबाट

जागरुक जनो ने प्रदेश सरकार के मुखिया से अहम मुद्दे पर गौर किये जाने की मांग की

 

रिपोर्ट राघवेंद्र मिश्रा/अशोक सिंह Naradsamvad.in

बाराबंकी-रामनगर कहने के लिये तो महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना गांवो मे मजदूर तबके के लिये वरदान स्वरुप मानी जा रही थी।लेकिन जिम्मेदार अधिकारियो की खाऊ कमाऊ नीति और जन प्रतिनिधियो के बदलने के साथ नये जॉब कार्डो को बनाकर सरकारी धन के बंदर बाट की कहानी का सिल सिला पुनः शुरु कर दिया जाता है।पिछले पंचवर्षीय काल मे सबसे अधिक दिन कितने लोगो ने कार्य किया यह बात कागजी फाईलो मे गुम होकर नये जाब कार्ड धारको के नाम दर्ज हो जाता है।जागरुक जनो मे सवाल तो इस बात का है कि ग्राम पंचायत से लेकर जिला स्तर तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी व्यापक रुप से चल रहे इस बंदरबाट की ओर देखने सुनने को तैयार नही है।बडी संख्या मे जागरुक जनो ने प्रदेश सरकार के मुखिया से बेरोजगारो के हित मे केवल जो लोग कार्य करने के इच्छुक है उनके ही जाब कार्ड बनवाये जाने की मांग की है।जिससे जनप्रतिनिधियो के बदलने के साथ मनरेगा मे अगले पंचवर्षीय काल तक सरकारी धन के बंदरबाट की कहानी के ऊपर विराम लग सके।मालूम हो कि त्रिस्तरीय पंचायती चुनावो के समपन्न हो जाने के बाद ग्राम पंचायतो मे नयी कैबिनेट ने अपना काम काज सम्भाल लिया है।विभागीय सूत्रो के मुताविक मनरेगा योजना मे अधिकतर जाब कार्ड धारक पिछले कार्यकाल के सहयोगी होते है।नये ग्राम प्रधान के साथ कमीशन के तहत धन निकासी का मामला तय हो पाता है कि नही ऐसी स्थिती मे अधिकतर प्रधान अपने परिजनो और समर्थको के जाब कार्ड बनवाकर पाच साल तक नये मजदूरो का सबसे अधिक कार्य करने का नया रिकार्ड फिर बना देते है।जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी और मनरेगा योजना के अन्तर्गत कार्यरत तकनीकी सहायक की गांधारी नजरो से यह सब ओझल रहता है।उन्हे तो केवल अपना हिस्सा दिखाई पडने के साथ माप पुस्तिका मे बढा चढा कर लेखा जोखा दर्ज कर कार्य को पास कर देते है।नयी कैबिनेट के गठन के बाद अब बंदरबाट वाले जाब कार्डो के बनने का कार्य शुरु हो चुका है।यहा पर सबसे अहम बात तो यह है कि जो लोग कार्य स्थल पर फावडा और टोकरी लेकर किसी भी कीमत पर दस लोगो के सामने खडे होना भी स्वीकार नही कर सकते वह लोग मनरेगा के अभिलेखो मे सबसे अधिक दिन कार्य करने वाले मजदूर दर्ज हो जाते है।शासन प्रशासन विगत सत्र मे अधिकतर गांवो से किसी एक के सभी जाब कार्डो की जाच करवा ले तो सारी सच्चाई मुह बाये खडी मिलेगी।अब ऐसा भी नही है कि यह सब अंधेरे मे होता हो सब कुछ लिखा पढी मे दर्ज है।कोरोना काल मे भाजपा सरकार की ओर से प्रवासी मजदूरो को प्रत्येक गांव मे आर्थिक मदद उपलब्ध कराई गयी वही पर कितने प्रवासी मजदूरो को कौन कौन से गांव मे कितने दिन मनरेगा योजना मे काम दिया गया जानकारो की माने तो ठीक इसके विपरीत जिन जिन गांवो मे मनरेगा योजना से कार्य समपन्न हुआ वहा ग्राम प्रधानो के चहेते जाब कार्ड धारको के नाम अधिकतर मजदूरी के तहत उनके खाते मे सबसे अधिक दिन कार्य दर्ज किये गये।सरकारी धन के इस बंदरबाट की कहानी का आधार नयी कैबिनेट के गठन के बाद से शुरु हो जाता है जो शुरुवाती दो चार माह मे अवैद्म रुप से धन की निकासी करने वाले कमीशन खोरो के जाब कार्ड बन जाने के बाद यह खेल पूरे पाच वर्ष तक जारी रहता है।यहा पर बात इतनी ही नही है।विकास खंड रामनगर और सूरतगंज मे तो नियमो का घोर उल्लघन कर इस योजना मे भी मौखिक रुप से ठेकेदारी प्रथा चलवाई जा रही है।क्षेत्र के जागरुक जनो ने प्रदेश सरकार के मुखिया से गांव गरीब के हित इस महत्व पूर्ण योजना के ऊपर चल रहे महालूट के ग्रहण से निजात दिलवाये जाने की मांग की है।

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