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भारतीय भौतिक विज्ञानी अशोक सेन बने ओस्कर क्लेन मेडल पाने वाले पहले भारतीय

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Naradsamvad - Narad news Agency
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भारतीय सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी Ashoke Sen को साल 2026 के Oskar Klein Medal से सम्मानित किया गया है। यह पहली बार है जब किसी भारतीय वैज्ञानिक ने इस प्रतिष्ठित सम्मान को हासिल किया है।

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International Centre for Theoretical Sciences ने 24 अक्टूबर 2026 को इस उपलब्धि की घोषणा की। Sen यहाँ ICTS-Infosys Madhava Chair Professor के तौर पर कार्यरत हैं।

यह सम्मान हर साल Stockholm University और Royal Swedish Academy of Sciences की Nobel Committee for Physics द्वारा दिया जाता है। इसका उद्देश्य भौतिकी के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान देने वाले वैज्ञानिकों को सम्मानित करना है।

विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की सूची में शामिल हुए

इस मेडल को पाने वाले पिछले विजेताओं में कई नोबेल पुरस्कार विजेता शामिल रहे हैं। इनमें Chen-Ning Yang, Steven Weinberg और Hans Bethe जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

इसके अलावा Stephen Hawking, Peter Higgs और Kip Thorne जैसी मशहूर हस्तियों को भी यह सम्मान मिल चुका है। Ashoke Sen का चयन सैद्धांतिक भौतिकी में उनके बुनियादी काम की वजह से किया गया है।

Sen ने 22 अक्टूबर 2026 को स्टॉकहोम के AlbaNova Centre में एक विशेष व्याख्यान दिया। इस 2026 Oskar Klein Memorial Lecture का शीर्षक Gravity from Strings and Strings from Gravity था।

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शोध और वैज्ञानिक उपलब्धियों का विवरण

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार यह मेडल उनके द्वारा किए गए अग्रणी शोध के लिए दिया गया है। इसमें S-duality, ब्लैक होल एंट्रॉपी की सटीक गणना और string field theory पर उनका काम शामिल है।

इन जानकारियों की पुष्टि ICTS, The Hindu और The Indian Express की रिपोर्टों के जरिए की गई है। स्ट्रिंग थ्योरी यह मानती है कि पदार्थ के बुनियादी तत्व बिंदु कणों के बजाय छोटे एक-आयामी स्ट्रिंग्स होते हैं।

Sen ने S-duality या स्ट्रॉन्ग-वीक कपलिंग डुअलिटी पर अपने काम से भौतिक प्रणालियों के बीच गहरे संबंधों को दिखाया। इससे कई स्ट्रिंग सिद्धांतों को एक ही ढांचे में जोड़ने में मदद मिली।

ब्लैक होल माइक्रोस्टेट्स की उनकी सटीक गणना ने गुरुत्वाकर्षण की क्वांटम प्रकृति की वैश्विक समझ को आगे बढ़ाया है। यह अंतरराष्ट्रीय मान्यता भारत आधारित भौतिक विज्ञानी को दुनिया के दुर्लभ सिद्धांतकारों के समूह में खड़ा करती है।

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भारतीय संस्थानों की मजबूती और सम्मान

यह उपलब्धि भारत के वैज्ञानिक संस्थानों की ताकत को दर्शाती है। इसमें बेंगलुरु स्थित ICTS-TIFR और Harish-Chandra Research Institute शामिल हैं, जहाँ Sen ने पहले काम किया था। Business Standard और India Today ने भी इस बात का जिक्र किया है।

भारत सरकार के Principal Scientific Adviser के कार्यालय ने इस उपलब्धि पर भौतिक विज्ञानी को बधाई दी है। ICTS के डायरेक्टर Rajesh Gopakumar ने कहा कि Sen का केंद्र में होना उत्कृष्टता की मिसाल रहा है।

अब उनके सहयोगी और छात्र उन्हें एक ठोस रोल मॉडल के रूप में देखते हैं। यह साबित करता है कि भारत में बुनियादी विज्ञान में करियर बनाना संभव है और इसे सम्मान भी मिलता है।

यह पुरस्कार उनके जीवन भर के योगदान को मान्यता देता है, जिनका जिक्र पहले Breakthrough Prize और Dirac Medal कमेटियों ने भी किया था।

शैक्षणिक सफर और अब तक मिले पुरस्कार

Ashoke Sen का जन्म 1956 में Calcutta में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान एक लंबा और विस्तृत शैक्षणिक रास्ता तय किया है।

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उन्होंने कोलकाता के Presidency College से बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने IIT Kanpur से मास्टर ऑफ साइंस और 1982 में Stony Brook University से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की।

अगले कुछ दशकों में उन्हें कई बड़े पेशेवर सम्मान मिले, जो इस प्रकार हैं:

  • 1989: ICTP Prize
  • 1994: Shanti Swarup Bhatnagar Prize
  • 1998: Royal Society के फेलो चुने गए
  • 2001: Padma Shri
  • 2009: Infosys Prize in Mathematical Sciences
  • 2012: Breakthrough Prize in Fundamental Physics
  • 2013: Padma Bhushan
  • 2014: Dirac Medal

Ashoke Sen अभी भी ICTS में अपना शोध जारी रखे हुए हैं। यह पुरस्कार आने वाले वैज्ञानिक आयोजनों और चर्चाओं का हिस्सा बनेगा, जिसमें दुनिया के मंच पर भारतीय विज्ञान की भूमिका पर बात होगी।

भविष्य में इस बात पर गौर किया जा सकता है कि क्या ऐसी उच्च स्तरीय मान्यता से शुद्ध सैद्धांतिक शोध के लिए संस्थागत समर्थन बढ़ेगा। इस तरह के शोध का तुरंत कोई व्यावसायिक उपयोग नहीं होता, लेकिन ब्रह्मांड के नियमों को समझने के लिए यह बहुत जरूरी है।

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